हिंदी कविता - मेरा नया बचपन (Mera Naya Bachpan)

Hindi Poem - Mera Naya Bachpan


बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।

गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥


चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।

कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?


ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?

बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥


किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।

किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥


रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।

बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥


मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।

झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥


दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।

धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥


वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।

लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥


लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।

तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥


दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।

मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥


मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।

अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥


सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।

प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥


माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।

आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥


किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।

चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥


आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।

व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥


वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।

क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?


मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।

नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥


'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।

कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥


पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।

मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥


मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।

हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥


पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।👧

उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥


मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।

मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥


जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।

भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥ 😊


-- सुभद्राकुमारी चौहान (Subhadra Kumari Chauhan)


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हिंदी भाषा (Hindi Language)

मित्रो , हिंदी भारत में बोली जाने वाली सबसे प्रमुख भारतीय भाषा है।  आइये थोड़ा इसके बारे में जानते है। 

हिंदी भाषा (Hindi Language)

हिंदी का उद्गम 

हिंदी की उत्पत्ति ठीक प्रकार से ज्ञात नहीं है।  जो लोग हिंदी को कुछ शताब्दियों पुराना ही मानते हैं , वे सही नहीं हैं।  हिंदी अपने स्थानीय रूपों में बहुत पहले से ही भारत में उपस्थित थी। आधुनिक हिंदी इन्हीं स्थानीय हिंदी भाषाओँ  के मिश्रण का परिष्कृत और औपचारिक रूप मात्र है। 

हिंदी का नामकरण 

हिंदी का नामकरण अरब के रहने वाले लोगों द्वारा किया गया है जो कि भारतीय उपमहाद्वीप को 'हिन्द' , इसमें रहने वाले लोगों को 'हिन्दू' और यहाँ की भाषा को 'हिंदी' कहा करते थे। 

हिंदी का प्रभुत्व 

भारत में हिंदी का प्रभाव क्षेत्र बहुत बड़ा है। उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में हिंदी प्रमुख भाषा के रूप में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त पश्चिमी भारत में हर प्रान्त की अपनी भाषा होते हुए भी हिंदी एक प्रमुख भाषा है। पूर्व में हिंदी असम , त्रिपुरा आदि राज्यों तक आसानी से बोली और समझी जाती है। दक्षिण भारत में हिंदी की पकड़ कमजोर है पर वहाँ भी हिंदी ने पैठ बनाई है। हैदराबाद और बैंगलोर जैसे शहरों में , जहाँ उत्तर भारतीय जन संख्या काफी है , हिंदी आसानी से समझी जाती है। 

हिंदी , भारत के अतिरिक्त हिंदी , नेपाल , मारीशस , फीजी , सूरीनाम , गुयाना , त्रिनिडाड, टोबैगो और साउथ अफ्रीका में भी बोली जाती है। इसके अतिरिक्त अपनी बहन उर्दू के रूप में हिंदी अधिकांश पाकिस्तान में भी समझी जाती है।

हिंदी की विशेषताएं 

  • हिंदी ऊपर नीचे और बायें से दायें लिखी जाती है। 

  • हिंदी भाषा जैसी लिखी जाती है , वैसी ही बोली जाती है, यानि कि अंग्रेजी की तरह नहीं , जिसमें GO गो होता है और TO टू होता है।

  • हिंदी में कोई छुपा हुआ (Silent) अक्षर नहीं होता : जैसे अंग्रेजी में Honest को 'हौनेस्ट' न बोलकर 'औनेस्ट' बोला जाता है क्योंकि इसमें 'H' अक्षर छुपा हुआ (Silent)  होता है , इस प्रकार छुपा हुआ (Silent) अक्षर हिंदी में नहीं होता। 

  • इसीलिए जब कोई भारतीय अंग्रेजी बोलता है तो , हिंदी में पालन पोषण होने के कारण उसका उच्चारण का तरीका हिंदी जैसा ही रहता है। वो अंग्रेजी को वैसे ही बोलता है जैसे अंग्रेजी लिखी होती है और बोलने समय छुपे अक्षरों (Silent Letters) का भी बिल्कुल ध्यान नहीं रखता। यही कारण है की पश्चिमी जगत के लोग भारतीयों के अंग्रेजी बोलने के तरीके को Thick Accent कहते हैं। 

  • हिंदी में कोई संक्षिप्त रूप (Short Form) नहीं होता : जैसे अंग्रेजी में 'कौन बनेगा करोड़पति' को KBC और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' को DDLJ कहा जाता है , उसी प्रकार हिंदी में 'कौन बनेगा करोड़पति' को 'कौ ब क' और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' को 'दि दु ले जा' नहीं कहा जाता है। 

  • आश्चर्यजनक रूप से , हिंदी के बहुत सारे विराम चिन्ह बिलकुल अंग्रेजी जैसे ही होते हैं , जैसे कि अर्ध विराम (Semicolon) , अल्प विराम (Coma) इत्यादि।  यहाँ तक कि प्रश्नचिन्ह (Question Mark) और विस्मयादिबोधक चिह्न (Exclamation Mark) भी। अब यहाँ यह बताना मुश्किल है कि यह हिंदी पर अंग्रेजी का प्रभाव है या , अंग्रेजी पर हिंदी का। 

  • हिंदी में भी अंग्रेजी की ही भांति स्वर (Vowels) और व्यंजन (Consonant) होते है , जहाँ व्यंजन एक अक्षर होता है , वहीँ स्वर अक्षर होने के साथ साथ एक मात्रा के तौर पर भी प्रयुक्त होता है और व्यंजनों को अलग अलग प्रकार से बोलने में सहायता करता है। (और पढ़ें : हिंदी वर्णमाला (Hindi Alphabets))

  • वर्णमाला में हिंदी के अक्षर जीभ , तलुए  और होंठो की गति के अनुसार क्रम में होते हैं : जी हाँ , जहाँ अंग्रेजी के अक्षर वर्णमाला में बेतरतीब तरीके से किसी भी क्रम में नहीं होते और कोई नहीं जानता कि A के बाद B क्यों आता है , वहीं दूसरी और हिंदी के अक्षर एक क्रम में आयोजित होते हैं।  यह क्रम अक्षर को बोलने में हमारी जीभ , तलुए और होंठो की गति के अनुसार होता है। यदि आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि क , ख , ग , घ बोलने में हमारी जीभ , तलुए  और होंठो की गति लगभग एक ही प्रकार से होती है और इसी प्रकार च , छ , ज , झ बोलने में बोलने हमारी जीभ , तलुए  और होंठो की गति समान प्रकार से होती है। 

  • हिंदी में स्त्री लिंग और पुर्लिंग की क्रिया (Verb), अलग अलग प्रकार से बोली जाती है।  जैसे कि "लड़का खेलता है" बोला जाता है और "लड़की खेलती है" बोला जाता है। इसी प्रकार नपुंसकलिंग की वस्तुओं को भी स्त्रीलिंग और पुर्लिंग के आधार पर ही बोला जाता है। जैसे "बस आ गयी" और "रिक्शा आ गया " । यह अनूठी विशेषता किसी भी विदेशी भाषा में नहीं पायी जाती। अधिकतर पुर्लिंग बोध के लिए 'आ' की मात्रा का और स्त्रीलिंग बोध के लिए 'बड़ी ई' की मात्रा का प्रयोग होता है। 

  • पुरुष प्रधान समाज होने के कारण जहाँ पुर्लिंग और स्त्रीलिंग को एक साथ इंगित करना हो वहां पुर्लिंग शब्दों का ही प्रयोग होता है। जैसे कि यदि किसी समारोह में 500 स्त्री और पुरुष उपस्थित हैं तो कहा जायेगा कि 'समारोह में 500 आदमी आए हैं' न कि 'समारोह में 500 औरतें आई हैं'।

  • एक और बहुत ही रोचक बात यह है की अंग्रेजी के Articles (a , an , the) समझने और बच्चों को समझाने में हिंदी , अंग्रेजी से अच्छी साबित होती है। जैसे कि अंग्रेजी में जो शब्द vovels से , यानि कि a ,e ,i ,o ,u से शुरू होते हैं उनसे पहले a न लिखकर an लिखा जाता है। यह परिभाषा तब फेल हो जाती है , जब बच्चे के सामने User, Europion और Eucalyptus जैसे शब्द आते है और वो समझ नहीं पाता कि इनसे पहले an क्यों नहीं लगता।  तब आप बच्चे को हिंदी की सहायता से आसानी से समझा सकते हैं अंग्रेजी के  a ,e ,i ,o ,u से शुरू होने वाले शब्द यदि हिंदी के स्वरों की ध्वनि यानि कि अ , आ , इ , ई , उ , ऊ , ओ , औ कि ध्वनि से शुरू हों तभी an का प्रयोग होता है और User, Europion और Eucalyptus यू  के ध्वनि से शुरू होते हैं इसीलिए इनसे पहले an का प्रयोग नहीं होता। 

हिंदी और संस्कृत  में समानता एवं भिन्नता 

हिंदी की वर्णमाला पूरी तरह संस्कृत से ली गयी है और इसकी शब्दावली में भी अधिकांश शब्द संस्कृत भाषा से लिए गए हैं । वर्णमाला और शब्दावली की समानता होते हुए भी हिंदी की व्याकरण संस्कृत से पूरी तरह भिन्न है। हिंदी में कोई शब्दरूप या धातुरूप नहीं होता। हिंदी में संस्कृत की तरह हलन्त या विसर्ग भी नहीं होते।

हिंदी और उर्दू में समानता एवं भिन्नता 

जब भारत पर मुस्लिम राजाओ ने राज किया तो वो अपने साथ फारसी भाषा को लाये , इसीलिए फारसी उस समय राजदरबारों की भाषा बन गयी , लेकिन स्थानीय जनमानस तब भी स्थानीय हिंदी ही बोलता था। दो अति विकसित भाषाओँ के मिश्रण से एक ऐसी भाषा ने जन्म लिया जिसकी व्याकरण तो हिंदी की ही थी पर शब्दावली में स्थानीय हिंदी, संस्कृत और फारसी का मिश्रण था। यह नई भाषा , देवनागरी और फारसी दोनों लिपियों में लिखी जा सकती थी। इसको हिंदुस्तानी कहा जाने लगा। कालान्तर में हिन्दुओं ने इस हिंदुस्तानी भाषा के उस रूप में अपनाया जिसकी लिपि हिंदी की देवनागरी लिपि थी और जिसमें स्थानीय हिंदी और संस्कृत के शब्द अधिक थे। इस भाषा को हिंदी कहा गया। वहीं दूसरी ओर मुसलमानों ने फारसी लिपि पर आधारित हिंदुस्तानी को अपनाया जिसमें फारसी के शब्द अधिक थे। इसे उर्दू कहा गया। इसीलिए हिंदी और उर्दू बोलने में एक जैसी हैं और लिखने में बहुत अलग अलग हैं। और पढ़ें : फारसी एवं अन्य भाषाओं के शब्द जो हम हिंदी में प्रयोग करते हैं। (Persian and Other Language Words Which We Use in Hindi)

हिंदी पर अंग्रेजी का प्रभाव 

संस्कृत और फारसी के बाद यदि किसी भाषा ने हिंदी पर अपना प्रभाव डाला है तो वह है अंग्रेजी। आज की हिंदी में अंग्रेजी शब्दों की भरमार है। 

भारत पर अंग्रेजों के 190 साल के राज के कारण आज कृपया, क्षमा कीजिये और धन्यवाद की बजाय , प्लीज (Please), सॉरी (Sorry) और थैंक्यू (Thank You) जैसे अंग्रेजी के शब्द अधिक प्रयोग होते हैं। वास्तव में अंग्रेजों को भारत में अपना राज और व्यापार करने के लिए ऐसे कर्मचारियों की आवश्यकता थी जो अंग्रेजी जानते हों , इसलिए उन्होंने हम पर अंग्रेजी का जुआ लाद दिया , जिसे हम आज तक उतार नहीं पाए हैं। इसीलिए आज की हमारी शिक्षा पद्यति में अंग्रेजी का इतना महत्त्व है कि बच्चों को हिंदी में  आधुनिक गिनती भी नहीं आती।  और तो और लोगों को यह भी नहीं पता कि जिस गिनती को वे अंग्रेजी में पढ़ते हैं उस गिनती का जन्म दाता देश भारत ही है। 

आधुनिक विज्ञान की अधिकतर शब्दावली भी अंग्रेजी में ही है , इसीलिए आधुनिक हिंदी में कई वैज्ञानिक शब्द सीधे तौर पर प्रवेश कर गए हैं , जैसे कंप्यूटर , लैपटॉप इत्यादि। (और पढ़ें : 100 तक हिंदी की गिनती (Hindi Counting Up To 100))

और विश्व में पाश्चात्य जगत के प्रभुत्व के कारण भी आधुनिक हिंदी में अंग्रेजी के बहुत सारे शब्द प्रवेश कर गए हैं। यह प्रभाव इतना गहरा है कि एक नई भाषा हिंगलिश (Hinglish) ने जन्म ले लिया है। इसमें हिंदी का वाक्य को अंग्रेजी लिपि में लिखा जाता है। इसका प्रयोग व्हाट्स ऍप (Whats App), फेसबुक (Facebook) जैसे सोशल नेटवर्किंग (Social Networking) मंचों पर बहुत होता है। 

व्यावहारिक हिंदी

मित्रों , किसी भी अन्य भाषा की तरह ही, पढाई जाने वाली हिंदी और व्यावहारिक हिंदी में अंतर होता है। जैसे यदि आपको अपने से छोटे (आयु में) व्यक्ति से पानी मंगाना है तो व्यावहारिक हिंदी में आप कहेंगे की 'जरा पानी ले अइयो' , परन्तु पढाई जाने वाली हिंदी में 'अइयो' शब्द होता ही नहीं है। 

जैसा ऊपर उल्लेख किया गया है , समय के साथ हमारी आधुनिक हिंदी में अंग्रेजी और फारसी के बहुत सारे शब्द समाहित हो गए हैं। ऐसा नहीं है उन शब्दों के हिंदी समकक्ष उपलब्ध नहीं हैं , परन्तु पीढ़ियों से हमारी उन शब्दों को प्रयोग करने की आदत हो गयी है। यह आदत रातों रात तो नहीं बदल सकती परन्तु यदि हम कोशिश (प्रयत्न) करें और हम एक शब्द एक महीने में भी शुद्ध हिंदी का प्रयोग करने के आदत डाल लें तो अपनी अगली पीढ़ी को हम थोड़ी अधिक शुद्ध हिंदी विरासत (उत्तराधिकार) में देकर जायेंगे। और हो सकता है कि कुछ पीढ़ियों बाद बिल्कुल शुद्ध हिंदी हमारे देश में बोली जाये।  कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती , धन्यवाद। 


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भगवान श्री राम (Lord Shri Rama)

राम जन्म 

त्रेता  युग में कौशल राज्य में इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ राज्य करते थे। उनकी राजधानी अयोध्या थी ,जो  सरयू नदी के तट पर बसी थी।  राजा दशरथ  की तीन रानियां थीं - कौशल्या ,सुमित्रा और कैकेयी ,किन्तु तीनों के कोई संतान नहीं थी। राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए एक यज्ञ करने का निर्णय किया। यज्ञ संपन्न करने के लिए महाराज दशरथ स्वयं श्रृंगी ऋषि को बुलाकर लाये। महाराज दशरथ ने अग्निकुंड में जब अंतिम आहुति डाली तो स्वयं अग्निदेव हाथ मे  खीर का एक पात्र लिए उनके सामने प्रकट हो गए। राजा ने खीर का पात्र रानी कौशल्या को दे दिया। कौशल्या ने आधी खीर अपने लिए रखकर शेष रानी सुमित्रा को दे दी। सुमित्रा ने उसमें से आधी खीर रखकर बाकी रानी कैकेयी को दे दी। कैकेयी ने उसमें से आधी खीर खाकर बाकी सुमित्रा को लौटा दी। खीर खाकर तीनों  रानियाँ गर्भवती हो गईं। समय आने पर रानियों ने पुत्रों को जन्म दिया। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को महारानी कौशल्या के गर्भ से राम का जन्म हुआ। दूसरी रानी सुमित्रा ने दो पुत्रों लक्ष्मण और शत्रुघन को जन्म दिया। छोटी रानी कैकेयी के गर्भ से भरत उत्पन्न हुए।



ताड़का वध 

चारों राजकुमार जब कुछ और बड़े हुए तो राजा दशरथ ने उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए आश्रम में भेज दिया। शिक्षा पूर्ण होते -होते राजकुमारों ने युवावस्था में प्रवेश किया।  राजा दशरथ और तीनों रानियाँ राजकुमारों के विवाह के बारे में सोचने लगे।  तभी ऋषि विश्वामित्र का आगमन हुआ। उन्होंने रावण के अनुचर राक्षस मारीच और सुबाहु से अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राजा दशरथ से राम को माँगा। राजा दशरथ को विश्वामित्र की बात स्वीकार न हुई , और उन्होंने ऋषि की सहायता के लिए स्वयं को और अयोध्या की सेना को प्रस्तुत किया।  राजा दशरथ का प्रस्ताव सुनकर विश्वासमित्र क्रोधित हो उठे और वहां से जाने लगे। तब राजगुरु वशिष्ठ ने राजा दशरथ को समझाया कि महर्षि विश्वामित्र जो कह रहे हैं , अवश्य ही उसमें राम का कुछ भला निहित होगा। राजगुरु की बात सुनकर दशरथ ने विश्वामित्र का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

राम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ चल पड़े। रास्ते में गुरु विश्वामित्र ने उन्हें बाला और अतिबला नामक गुप्त विद्याओं का ज्ञान दिया। तभी राक्षसी तड़का ने उनपर आक्रमण कर दिया। राम ने एक तीक्ष्ण  बाढ़ से उसका वध कर दिया। ताड़का के वध से प्रस्सन होकर विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को कई दिव्यास्त्र प्रदान किये।  इसके बाद पाँच दिन तक यज्ञ बिना किसी विघ्न के चलता रहा।  छटे दिन तड़का के पुत्र मारीच ने अपने साथी सुबाहु और सेना सहित आक्रमण कर दिया। राम ने मारीच पर मानवास्त्र का प्रयोग किया जिससे वह सुदूर दक्षिण में समुद्र के पास जा गिरा। आग्नेय अस्त्र चलाकर राम ने सुबाहु का भी वध कर दिया और वायव्य अस्त्र से सारी सेना का नाश कर दिया । विश्वामित्र का यज्ञ सम्पन्न हुआ।

अहिल्या का उद्धार 

इसके  पश्चात विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर मिथिला नगर की ओर चल पड़े। राह में गौतम ऋषि का वीरान आश्रम दिखाई पड़ा। राम के पूछने पर विश्वामित्र ने उनको गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या की कहानी सुनाई कि , कैसे एक श्राप के फलस्वरूप अहिल्या पत्थर की शिला में परिवर्तित हो गयीं और कहा की राम के स्पर्श से ही उनको मुक्ति मिलेगी। राम ने आश्रम में प्रवेश कर शिला को स्पर्श करके अहिल्या को श्राप मुक्त किया।

सीता से विवाह 

विश्वामित्र राम लक्ष्मण सहित जनकपुरी ( मिथिला नगरी )पहुंचे। राजा जनक ने उनका स्वागत किया। उस समय जनकपुरी में राजा जनक की पुत्री सीता का स्वयंवर आयोजित किया जा रहा था।  जिसकी शर्त थी कि जो सुनाभ
नामक शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा सकेगा , उसी से सीता का विवाह होगा। स्वयंबर में जब बड़े -बड़े राजा महाराजा उस धनुष को तनिक भी हिला न सके , तब गुरु विश्वामित्र के कहने पर राम ने उस धनुष न केवल सरलता से उठा लिया बल्कि उसपर प्रत्यंचा भी चढ़ाने लगे कि तभी भयंकर नाद के साथ धनुष के दो टुकड़े हो गए। धनुष के टूटते ही राजा जनक के हर्ष की सीमा न रही।तभी वहां हाथ में फरसा और धनुष लिए क्रोध से काँपते परशुराम सामने आ खड़े हुए। राजा जनक और सभी राजागण उनका यह रूप देखकर भयभीत हो गए। लक्ष्मण जी का परशुराम से वाद विवाद आरम्भ हो गया। भगवान राम ने बीच में पड़कर न केवल लक्ष्मण जी का बचाव किया वरन अपने वाक चातुर्य से परशुराम जी का ह्रदय भी जीत लिया। भगवान राम से बातचीत के दौरान परशुराम को भगवान राम के विष्णु रूप का आभास हुआ। उन्होंने राम को अपने विष्णु धनुष पर बाण संधान  के लिए कहा।  राम ने बड़ी सहजता से यह कर दिया और बोले , "मुनिवर मैं इस बाण से आपकी अर्जित तप शक्ति और आपकी मन की गति से चलने की शक्ति छीन सकता हूँ। " परशुराम भगवान राम के विष्णु रूप को पहचान गए। उन्होंने राम से क्षमा याचना की कि भले ही उस बाण से उनका अर्जित तप नष्ट कर दें पर उनकी मन की गति से से विचरण की शक्ति न छीनें जिससे वो समय पर महेंद्र पर्वत पर पहुँच सकें और वे भगवान राम का गुणगान करते हुए चले गए।

परशुराम के जाने से राजा जनक ने चैन की साँस ली और ऋषि विश्वामित्र से आज्ञा लेकर यह शुभ समाचार महाराज दशरत को भेजकर उन्हें बारात लाने का निमंत्रण भेज दिया। यह समाचार सुनकर पूरी अयोधया नगरी में प्रसन्ता की लहर दौड़ पड़ी। महाराज दशरत बारात लेकर मिथिला की ओर चल पड़े। वेद मंत्रो के उच्चारण के साथ राम और सीता , लक्ष्मण और उर्मिला , भरत और मांडवी तथा शत्रुघन और श्रुतकीर्ति का विवाह भी सम्पन्न हुआ।

राम को वनवास 

मिथिला से लौटने के बाद भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल कैकेय देश चले गए। उधर दशरथ की उम्र हो चली थी इसलिए उन्होंने अपने मंत्रियों से विचार विमर्श करके राम को युवराज बनाने के घोषणा कर दी। अयोध्यावासियों के हर्ष का ठिकाना न रहा। रानी कैकयी भी राम के राज्याभिषेक से बहुत प्रसन्न थीं। परन्तु मंथरा नामक एक कुबड़ी दासी को राम का राज्याभिषेक नहीं सुहाया। उसने कैकयी को यह कहकर भड़का दिया कि राम के राजा बनने के पश्चात् , कौशल्या राज माता बन जाएंगी और कैकयी को एक दासी के रूप में रहना पड़ेगा। कैकयी मंथरा की बातों मे आ गयी और कोप भवन जा पहुंची। राजा दशरथ को यह समाचार मिला तो उन्होंने जाकर कैकयी से कोप भवन जाने का कारण पूछा। तब कैकयी ने उनको उन दो वचनो की याद दिलाई  जो महाराज दशरथ ने कैकयी को तब दिए थे जब कैकयी ने शंबासुर से इंद्र देव के युद्ध में महाराज दशरथ की सहायता की थी। कैकयी ने अपने पहले वरदान में भरत के लिए राजगद्दी मांगी और दूसरे में राम को 14 वर्ष का वनवास।  राजा दशरथ के लिए यह बहुत असहय था। उन्होंने कैकयी को समझाने का बहुत प्रयत्न किया किन्तु सब व्यर्थ रहा। जब यह सब भगवान राम को पता चला तो वह सहर्ष ही वन जाने के लिए तैयार हो गए। लक्ष्मण और सीता ने भी राम के साथ वन में जाने का आग्रह किया, जिसे राम ने स्वीकार कर लिया। उन तीनों ने वल्कल वस्त्र धारण कर वन में प्रस्थान किया। मंत्री सुमंत्र उनके रथी बने और अयोध्या वासी उनके रथ के पीछे पीछे चलते रहे। अयोध्या वासियों को एक स्थान पर छोड़ कर राम सुमंत्र के साथ रथ पर आगे बढ़ गए।

निषादराज गुह को जब राम के आने का समाचार मिला तो वे अपने बंधू बांधवो सहित राम का स्वागत करने आ पहुंचे। वह अपने साथ कंद -मूल फल आदि उपहार स्वरुप लाये थे । उनका प्रेम देख कर राम ने उन्हें गले लगा लिया। एक रात वहीं रूककर अगली सुबह राम ने मंत्री सुमंत्र से अयोध्या वापिस लौटने  का आग्रह किया। सुमंत्र वापिस लौट गए। सुमंत्र के लौटने के बाद राम ने गुह से भी विदा ली और गंगा नदी पार करके , भारद्वाज ऋषि के आश्रम होते हुए चित्रकूट पहुंचे। चित्रकूट में मंदाकिनी नदी के किनारे पर्णकुटी बनाकर वे वहीं रहने लगे।

दशरथ का देहांत 

सुमंत्र को अकेले लौटे देखकर दशरथ को बहुत गहरा आघात पहुंचा और उन्होंने पुत्र वियोग में प्राण त्याग दिए। दशरथ के पुत्र वियोग  में प्राण त्यागने के पीछे के एक श्राप की कहानी कुछ इस प्रकार है। श्रवण कुमार नामक एक युवक अपने अंधे माता पिता को तीर्थ यात्रा कराता हुआ सरयू नदी के किनारे पहुंचा। अपने माता पिता को बिठा कर वो उनके लिए पानी लेने सरयू नदी के किनारे पहुंचा। पानी भरते हुए लोटे की आवाज़ को सुनकर वहीं आखेट पर आए  हुए राजा दशरथ ने किसी पशु के पानी पीने की आवाज़ सोच कर शब्दभेदी बाण चला दिया। बाण श्रवण कुमार को आ लगा। अपने बाण से युवक को मरते देख राजा दशरथ को अपनी गलती का एहसास हुआ और वे  श्रवण कुमार से जानकर उनके माता पिता के लिए पानी लेकर गए। अपने पुत्र के स्थान पर किसी और को आया जानकर और दशरथ से सारी बात पता चलने के बाद श्रवण कुमार के माता पिता ने दशरथ को श्राप दिया  कि जिस प्रकार वे पुत्र वियोग में मर रहे हैं उसी प्रकार दशरथ भी पुत्र वियोग में मरेगा। इसके बाद उन्होंने प्राण त्याग दिए।

भरत मिलाप 

उधर अयोध्या में भरत  को ननिहाल से दूत भेज कर वापिस बुलाया गया। जब अयोध्या पहुँच कर भरत को सारी बात पता चली तो उन्होंने माता कैकयी को बहुत बुरा भला कहा और माता कौशल्या को विश्वास दिलाया कि जो कुछ भी हुआ उसका उन्हें आभास भी न था। पिता के दाह संस्कार के बाद मंत्रियों ने जब भरत से राज गद्दी सँभालने की बात कही तो उन्होंने भरी सभा में घोषणा की कि अयोध्या के राज्य पर केवल राम का अधिकार है और उन्होंने राम को लौटा लाने के लिए चित्रकूट जाने का निश्चय किया।

अगले दिन गुरु वशिष्ठ , माताओं , अयोध्या की चतुरंगिणी सेना और अयोध्या वासियों को लेकर भरत चित्रकूट की ओर चल पड़े। लक्ष्मण ने दूर से ही अयोध्या के ध्वजों को पहचान लिया। लक्ष्मण को लगा कि भरत सेना सहित उनपर आक्रमण के लिए आ रहे हैं। लक्ष्मण भी युद्ध के लिए तत्पर हो गए। राम के समझाने से लक्ष्मण शांत हो गए। थोड़ा निकट आने पर भरत की दृष्टि राम, लक्ष्मण और सीता पर पड़ी। राम को देखते ही भरत का धैर्य छूट गया। वे व्याकुल हो दौड़कर राम के चरणों पर गिर पड़े। राम को भी अपनी सुध -बुध न रही। दोनों भाइयों का प्रेम  अश्रु बनकर बहने लगा। राम ने भरत को उठाकर छाती से लगा लिया। उसके पश्चात् राम बड़े प्रेम पूर्वक गुरु ,माताओं और अयोध्या वासियों से मिले। माता कैकयी ने अपने व्यव्हार के लिए राम से खेद जताया।  पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर राम बहुत दुखी हुए। भरत सहित  माताओं, गुरुओं और अयोध्या वासियों ने राम से अयोध्या चलने का आग्रह किया पर राम नहीं माने।  भरत  भी अपने हठ पर अड़े रहे। जब राम किसी भी प्रकार लौटने को तैयार नहीं हुए तो भरत ने घोषणा की कि अयोध्या के सिंहासन पर राम की खड़ाऊं रखी रहेंगी और वे स्वयं तपस्वी वेश में एक सेवक की भांति नगर से बाहर नंदी ग्राम में रह कर राज्य भर संभालेंगे। 

अत्रि ऋषि से भेंट 

भरत के लौट जाने के पश्चात् ,काफी समय चित्रकूट में बिता कर राम ने दक्षिण की ओर अपनी यात्रा आरम्भ की। मार्ग में अत्रि ऋषि का आश्रम था। अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया ने सीता माता को दिव्या वस्त्र ,माला और आभूषण दिए ,इनकी विषेशता यह थी की न वे कभी मैले होते थे और न कभी फटते थे।

अगस्त्य मुनि से दिव्यात्र प्राप्ति 

अत्रि ऋषि से विदा लेकर राम दण्डक वन में पहुंचे। वहाँ ऋषि मुनियो ने  राम को बताया की किस प्रकार राक्षस ऋषि मुनियो के यज्ञ में बाधा  डालते थे। तथा राक्षसों द्वारा मारे गए ऋषि मुनियो के कंकाल भी दिखाए। यह सब देख सुनकर राम ने प्रण किया की वे राक्षसों का नाश कर देंगे।  इसके बाद राम अगस्त्य ऋषि के शिष्य सुतिष्ण ऋषि के आश्रम में पहुंचे। सुतिष्ण ऋषि राम , लक्ष्मण और सीता को अगस्त्य मुनि के पास ले गए। अगस्त्य मुनि ने, राम को दिव्य अस्त्र शस्त्र प्रदान किये जिसमें विष्णु से मिला धनुष , ब्रह्मा से मिले अमोघ बाण तथा इंद्र का तरकश था जो कभी बाणों से खाली नहीं होता था। अगस्त्य ऋषि ने उन्हे गोदावरी के तट पर स्तिथ पंचवटी नामक स्थान पर रहने का परामर्श दिया।

पंचवटी में निवास , शूर्पणखा की नाक काटना एवं खर दूषण का वध 

पंचवटी पहुंचकर उन्होंने एक पर्णकुटी बनाई जिसमें वे रहने लगे। तभी वहां रावण की बहन शूर्पणखा आयी और राम के सौंदर्य पर मोहित हो गयी।  राक्षसी रूप छोड़ कर एक सुन्दर स्त्री के रूप में वे राम के पास गयी और उनसे प्रणय निवेदन करते हुए राम के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। राम ने सहजता से उस प्रस्ताव को ठुकराते हुए उसे लक्ष्मण के पास भेज दिया। जब लक्ष्मण ने भी उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया तो शूर्पणखा तिलमिला उठी और अपने वास्तविक रूप में आकर सीता को खाने के लिए दौड़ी यह देख कर लक्ष्मण ने उसपर प्रहार किया और उसकी नाक काट डाली। शूर्पणखा रोते बिलखते अपने सौतेले भाई खर और दूषण के पास पहुंची। उन्होंने अपनी भारी सेना के साथ रामऔर लक्ष्मण पर आक्रमण कर दिया। देखते ही देखते राम ने खर दूषण और उनकी सेना का वध कर दिया। खर दूषण के अंत के साथ दण्डक वन से राक्षसों का डर सदा के लिए दूर हो गया। इसके बाद शूर्पणखा अपने भाई रावण के पास पहुंची। शूर्पणखा की बात सुनकर रावण क्रोध से भर उठा। उसने समझा - बुझाकर शूर्पणखा को भेज दिया और सीता का हरण करने का निश्चय किया।



सीता हरण 

रावण मारीच के पास पहुंचा और उसे सीता हरण की अपने योजना से अवगत कराया। मारीच ने रावण को राम से शत्रुता ना करना की सलाह दी। मारीच की सलाह सुनकर रावण क्रोधित हो उठा जिससे अंततः विवश होकर मारीच रावण की सहायता के लिया तैयार हो गया। योजना अनुसार मारीच सोने का हिरन बनकर राम की कुटिया के आस पास घूमने लगा। सोने का हिरन देख कर सीता ने राम से उसको पकड़ लाने की इच्छा प्रकट की। लक्षमण को सीता की देखभाल के लिए कहकर राम हिरन के पीछे चले गए।  योजनानुसार मारीच उनको कुटिया से बहुत दूर ले गया।  हिरन को हाथ न आता देख, राम ने बाण चलाया। बाण लगने से मारीच अपने वास्तविक रूप में आकर तड़पने लगा और राम की आवाज में चिल्लाया, " लक्ष्मण , लक्ष्मण मुझे बचाओ। " यह देखकर राम असमंजस में पड़ गए और कुटिया की ओर चल पड़े।

उधर कुटिया में लक्ष्मण की लिए राम की पुकार सुनकर सीता व्याकुल हो उठीं। उन्होंने लक्ष्मण को राम की सहायता के लिए जाने की लिए कहा। लक्ष्मण ने सीता को बहुत समझाने का प्रयत्न किया की राम भैया किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम हैं और इस समय उनका सीता को अकेले छोड़कर जाना उचित न होगा पर सीता ने उनकी एक का सुनी तथा उनको कटु वचन कहने लगीं।  लक्ष्मण , सीता के वचनो से आहात होकर सीता को छोड़कर भैया राम की खोज में चल पड़े। किन्तु जाने से पहले उन्होंने कुटिया के चारों और एक रेखा बनाई और सीता से उस रेखा को पार न करने का आग्रह किया। लक्ष्मण को जाता देख , झाड़ियों की ओट में छुपा रावण सीता हरण के लिए आया किन्तु लक्ष्मण रेखा को पार न कर सका। तब उसने साधु रूप धारण करके बाहर से ही भिक्षा की आवाज लगाई।  द्वार पर भिक्षा के लिए साधु को आया देखकर सीता फल आदि लेकर बाहर आयीं और लक्ष्मण रेखा के अंदर से ही उसे भिक्षा देने लगीं।  रावण ने सीता को रेखा पार करकर बाहर आकर भिक्षा देने की लिए कहा और ऐसा न करने पर उनको और उनके पति श्राप देने के लिए कहने लगा। श्राप के भय से सीता रेखा पार करकर बाहर आ गयीं।  यह अवसर देख रावण ने सीता का हरण कर लिया और उनको लेकर अपने यान में आकाश मार्ग से लंका की ओर चल पड़ा। सीता की पुकार सुनकर मार्ग में गिद्ध जटायु ने रावण पर आक्रमण कर दिया।  परंतु रावण ने जटायु के पंख काट दिया जिससे वन धरती पर जा गिरा। मार्ग में एक पर्वत पर कुछ वानरों को बैठे देखकर सीता ने अपने आभूषण एक पोटली में बांध कर नीचे फेंक दिए। लंका पहुँच कर रावण ने सीता माता को अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा।

सीता की खोज एवं शबरी से भेंट 

उधर मारीच को मारकर कुटिया की ओर लौटते हुए राम ने जब लक्ष्मण को अपनी ओर आता देखा तो उनके ह्रदय में अनिष्ट के विचार आने लगे। जब राम ने लक्ष्मण से उनके पीछे आने का कारण पूछा तो लक्ष्मण ने उन्हें , सीता माता द्वारा कहे गए वचनों से अवगत कराया। दोनों भाई मिलकर शीघ्रता से कुटिया की और चल पड़े। जब वे कुटिया में पहुंचे तो उन्होंने सीता माता को वहां ना पाया। बहुत पुकारने पर भी जब कोई उत्तर न मिला तो वे व्याकुल ह्रदय से सीता माता को इधर उधर खोजने लगे। राम के नेत्रों से अश्रु बहने लगे और वे पागलों की भांति वन के पशु पक्षियों और पेड़ पौधों से सीता माता के विषय में पूछने लगे। बहुत खोजने के बाद भी सीता माता जब कहीं नहीं मिलीं तो वे उनकी खोज में आगे बढ़ गए। थोड़ी ही दूर पर उनकी भेट घायल जटायु से हुई। जटायु ने उन्हें रावण द्वारा सीता के हरण के विषय में बताया और यह भी बताया कि सीता माता का हरण करके रावण उनको दक्षिण दिशा में ले गया है। यह कहकर जटायु ने प्राण त्याग दिए। राम ने जटायु का अंतिम संस्कार किया और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। सीता माता की खोज में आगे बढ़ते हुए हुए राम और लक्ष्मण मतंग ऋषि के आश्रम में शबरी के पास पहुंचे। मतंग ऋषि के आश्रम में शबरी राम की प्रतीक्षा में ऑंखें बिछाए बैठी थी। वह  राम को देखकर उनके चरणों में गिर गयी। उसके मन की प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। वह अपने प्रभु राम को खिलाने के लिए बेर ले आयी। वह प्रेम वश चख चख कर राम को केवल मीठे बेर ही देने लगी।  राम ने बहुत ही प्रेम पूर्वक शबरी के जूठे बेर खाये। शबरी ने राम को सीता की खोज के लिए ,  ऋष्यमूक पर्वत पर जाकर सुग्रीव से मिलने की सलाह दी।  शबरी के सलाह मानकर राम ऋष्यमूक पर्वत  की ओर चल पड़े।

हनुमान एवं सुग्रीव से भेंट 

ऋष्यमूक पर्वत पर रहने वाले सुग्रीव ने जब दो युवको को धनुष -बाण लिए पर्वत की ओर आते देखा तो उसे शंका हुई कि उसके भाई बाली ने ही उसे मारने के लिए उन्हें भेजा है। उसने हनुमान को उन दोनों वीरो का परिचय प्राप्त करने के लिए भेजा।हनुमान वेश बदल कर राम और लक्ष्मण के पास पहुंचे। हनुमान ने उनसे उनका परिचय पूछा।प्रत्युत्तर में लक्ष्मण ने बताया की वे अयोध्या के राजा दशरत के पुत्र राम और लक्ष्मण और इस समय वनवास भोग रहे है। राक्षसों के राजा रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया है और वे उनको ढूंढने के लिए सुग्रीव की मदद चाहते हैं । हनुमान उनके उत्तर से संतुष्ट होकर अपने असली रूप में आ गए  और उनको आकाश मार्गः से सुग्रीव के पास ले आये। सुग्रीव के पास पहुंचकर हनुमान ने सुग्रीव को राम और लक्ष्मण का परिचय और उनके आने का कारण बताया। सुग्रीव ने राम को आभूषणों की वह पोटली दिखाई जो सीता ने रावण के यान में से नीचे गिराई थी। राम उन आभूषणो को पहचान कर शोकाकुल हो उठे। सुग्रीव ने राम को धीरज करवाया और मदद करने का आश्वासन दिया। तब राम ने सुग्रीव से उसके कष्टों के बारे में पूछा। सुग्रीव ने बताया कि किष्किंधा  का राजा बाली उसका बड़ा भाई है। एक बार एक मायावी राक्षस बाली को युद्ध के लिए ललकार कर गुफा में  घुस गया। बाली भी राक्षस के पीछे गया और  सुग्रीव को बाहर  खड़े रह कर प्रतीक्षा करने के लिए भी कह गया। एक महीने बाद गुफा में से रक्त की धारा बहने लगी। बाली  को मरा जान , राक्षस के भय से वो गुफा के द्वार पर  एक बड़ा पत्थर रखकर कर वापस लौट आया। उस परिस्तिथि में मन्त्रियों ने उसे किष्किंधा का राजा घोषित कर दिया।  वास्तविकता में बाली जीवित था। बाली किसी तरह शिला हटा कर नगर में आया तो  सुग्रीव वहाँ का राजा बना देखकर क्रोध से लाल -पीला हो गया। बाली ने सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया और उसकी स्त्री को भी उससे छीन लिया। अब वह सुग्रीव के प्राण लेना चाहता है। उससे बचने के लिए ही वह इस ऋष्यमूक पर्वत पर रह रहा है। मतंग ऋषि के श्राप के कारण बाली इस पर्वत पर नहीं आ सकता।

बाली वध 

सुग्रीव की बातें सुनकर राम ने कहा ",मैं एक ही बाण से बाली का वध कर दूंगा और तुम्हें तुम्हारा राज्य वापिस दिलवाऊंगा।" सुग्रीव को राम की बात पर विश्वास नहीं हुआ और उसने राम को बताया कि बाली को वरदान प्राप्त है की जो भी युद्ध में उससे लड़ेगा उसकी आधी शक्ति बालि के पास चली जाएगी। राम ने सुग्रीव को अपने बल का परिचय देते हुए एक हे बाण से सात वृक्षों को काट गिराया सुग्रीव  को राम की शक्ति पर विश्वास हो गया।

अगले दिन योजना अनुसार सुग्रीव ने बालि को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में मल्ल युद्ध होने लगा। राम पेड़ों के पीछे धनुष पर बाण का संधान कर खड़े थे , परन्तु सुग्रीव और बाली की शक्ल इतनी मिलती थी की राम बाली और सुग्रीव में अंतर न कर सके जिस कारण बाण ना चला सके। शीर्घ ही बाली सुग्रीव को मारने लगा और सुग्रीव किसी तरह अपने प्राण बचाकर ऋष्यमूक पर्वत पर वापिस आ गया। राम ने सुग्रीव को बाली का वध न करने का कारण बताया और नागपुष्पी की माला सुग्रीव के गले में डाल दी और फिर से बाली को युद्ध के लिए ललकारने को कहा। सुग्रीव ने पुनः बाली को ललकारा। बाली उस समय अपने पत्नी तारा के साथ अंतःपुर में था इतनी जल्दी सुग्रीव की दुबारा ललकार सुनकर तारा को कुछ संदेह हुआ। उसे राम लक्ष्मण के दंडकवन में होने का ज्ञान था। उसने बाली को सुग्रीव और राम लक्ष्मण की संभाविक मित्रता के बारे में बता कर सावधान रहने को कहा। पर बाली ने तारा की न मानी और सुग्रीव से युद्ध के लिए चल पड़ा। दोनों में भयंकर युद्ध होने लगा नागपुष्पी की माला के कारण राम बाली को पहचान पाए और उन्होंने उसपर बाण छोड़ दिया। बाण बाली की छाती में लगा और वे गिर कर तड़पने लगा तब राम उसके सामने आ गए। बाली ने राम से पूछा ,"मैंने आपका क्या बिगाड़ा था। आपने इस प्रकार का अधर्म क्यों किया ?" तब राम ने कहा कि जिसने अपने छोटे भाई की पत्नी को बल पूर्वक अपने पास रखा हो उसको मारकर मैंने धर्म की रक्षा ही की है। इसके बाद राम ने सुग्रीव को किष्किंधा का राजा घोषित कर दिया। 

सीता की खोज 

सुग्रीव ने राम को वर्षा ऋतु की समाप्ति में माता सीता की खोज का वचन दिया और किष्किंधा चला गया परन्तु जब शरद ऋतु तक भी सुग्रीव नहीं आया तो राम ने लक्ष्मण को किष्किंधा भेज कर सुग्रीव को उसका वचन याद दिलाने को कहा। लक्ष्मण बहुत क्रोध में किष्किंधा पहुंचे। लक्ष्मण को क्रोध में देख कर सुग्रीव भयभीत हो उठा। उसने लक्ष्मण से क्षमा मांगी तथा मंत्रियों को सारी वानर सेना एकत्रित करने का आदेश  दिया।  तब सुग्रीव हनुमान सहित कुशल वानरों के एक बड़े दल को लेकर राम के पास पहुंचा। उसने दल को चार भागों में बाँट दिया और चारो दलों को चारो दिशाओं में जाने का आदेश दिया और कहा कि एक माह के भीतर वे माता सीता को खोज कर उनका पता लगा कर आएं। दक्षिण दिशा को जाने वाले दल में अंगद ,हनुमान ,नल,नील, और जामवंत थे। राम ने हनुमान को अपनी अंगूठी देते हुए कहा की इस निशानी को देख कर सीता उन्हें पहचान जाएंगी। दक्षिण दिशा वाला दल नदी ,तालाब और पर्वतों को पार करते हुए समुन्द्र के किनारे जा पहुंचा ,  तभी वहां हनुमान की नज़र एक गिद्ध पर पड़ी।  परिचय का आदान प्रदान होने पर उसने अपना नाम संपाती बताया जब हनुमान ने उसे रावण द्वारा जटायु के मारे जाने के विषय में बताया तो वह बहुत दुखी हुआ और उसने हनुमान को बताया की जटायु उसका छोटा भाई था और उसने रावण को एक स्त्री का हरण करआकाश मार्ग से ले जाते हुए देखा था। वह स्त्री "हे राम हे लक्ष्मण" चिल्ला रही थी। वह अवश्य ही सीता होगी। रावण उन्हें लंका ले गया है।  सौ योजन का समुन्द्र पार कर लंका जाकर सीता का पता लगाया जा सकता है। सम्पाती की बात सुन कर सभी लोग चिंता में पड़ गए कि समुन्द्र कैसे पार किया जाये। जामवंत जानते थे की हनुमान शिव जी का अवतार है और असीमित शक्तियों के स्वामी है परन्तु एक श्राप के कारण उनकी शक्ति बंधी हुयी है , जो कि याद दिलाने पर वापस आ सकती है। जब जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्ति का याद दिलायी तो वे खड़े हो गये।  उन्होंने अपने आकार  का विस्तार किया और एक पर्वत पर चढ गए जिससे की वह एक ही छलांग में समुन्द्र पार  कर सकें।

हनुमान द्वारा समुन्द्र लांघना 

उन्होंने पवन देवता का स्मरण कर छलांग लगा दी और लंका की ओर उड़ गए। रास्ते में  मैनाक पर्वत ने उसने कुछ देर विश्राम करने का अनुरोध किया। मैनाक पर्वत को मना कर हनुमान आगे की ओर उड़ गए। आगे नागमाता  सुरसा ने राक्षसी के रूप में उनका रास्ता रोक लिया हनुमान ने सुरसा से उन्हें आगे जाने देने का अनुनय विनय किया परन्तु सुरसा न मानी और उसने कहा की हनुमान को उसके मुँह में जाना ही पड़ेगा और यह कह कर उसने अपना मुँह और बड़ा खोल दिया। ये देख हनुमान जी ने भी अपना रूप विस्तार किया सुरसा ने भी अपना मुँह सौ योजन तक खोल दिया तब हनुमान जी अपना अतिसूक्ष्म रूप धर कर सुरसा के मुँह में जाकर वापस आ गए। यह देख सुरसा अपने वास्तविक नागमाता के रूप में आ गयी और हनुमान की बुद्धि से प्रस्सन होकर उसने उनको  मनोरथ पूरे होने का वरदान दिया। हनुमान आगे चल पड़े।  सिंहिका  नामक एक राक्षसी ने उनकी छाया पकड़ कर उनको रोक लिया।  वो पक्षियों की छाया पकड़ कर उनको खा जाती थी। उसने हनुमान को भी खाने का प्रयत्न किया तो हनुमान ने उसका वध कर दिया और आगे उड़ चले। हनुमान समुन्द्र पार कर लंका के द्वार पर पहुंचे।

हनुमान की अशोक वाटिका में सीता से भेंट 

लंका के द्वार पर लंकिनी नमक एक राक्षसी पहरा दे रही थी है हनुमान ने अतिसूक्ष्म रूप धर कर लंका में घुसने का प्रवेश किया ,  परन्तु लंकिनी ने उन्हें देख लिया। हनुमान ने अपनी मुट्ठी के प्रहार से उसे धराशायी कर दिया।  तब लंकिनी को ब्रम्हा जी की बात स्मरण हो आयी की जब कोई वानर उसे मुष्टिका प्रहार से घायल करके लहुलुहान कर दे तो वो समझ जाए कि लंका का अंत समय आने वाला है। हनुमान ने लंका में प्रवेश किया। वे एक भवन से दूसरे भवन में जाकर सीता माता की खोज करने लगे। इसी क्रम में उन्होंने रावण को उसके भवन में सोया हुआ देखा और एक दूसरे भवन में मंदोदरी को सोते देख कर उनके सीता होने का आभास हुआ किन्तु जल्दी ही  उनको यह एहसास हुआ कि सीता रावण की कैद में इस प्रकार निश्चिंत होकर नहीं सो सकतीं। हनुमान आगे बढ़ चले। ढूंढ़ते ढूंढ़ते वे अशोक वाटिका जा पहुंचे जहा एक स्त्री वृक्ष के नीचे बैठी थी और उसको भयंकर राक्षसियों ने घेर रखा था। हनुमान को लगा की वे ही माता सीता हैं और वे उसी वृक्ष के पत्तो में छुप कर सीता माता से मिलने का मौका ढूंढने लगे। तभी वहां रावण मंदोदरी सहित आया और तरह तरह से सीता माता को डराने लगा। सीता ,माता ने उसे बहुत लताड़ा तथा श्री राम प्रभु के बाणो की तीक्ष्णता और उनके हाथों रावण के होने वाले सर्वनाश की बात कही। रावण सीता माता को एक माह की अवधि में उसकी बात मान लेने की चेतावनी देकर तिलमिलाता हुआ चला गया। रावण के जाने के बाद त्रिजटा नामक एक प्रधान राक्षसी ने सभी राक्षसियों को बुला कर बताया की उसने लंका के विनाश का एक स्वपन देखा है ,कहीं वह स्वपन सच न होजाये इसी आशंका से उनको सीता को डराना धमकाना नहीं चाहिए । यह सुन कर सभी राक्षसियाँ सीता से दूर चली गयीं। यही सही मौका जान हनुमान जी पेड़ पर से ही भगवान राम की कथा गाने लगे।  सीता माता कथा सुन कर आश्चर्यचकित थीं , तब हनुमान पेड़ से उतर कर सीता माता के सामने आ गए उन्हें देख सीता के मन में ये संदेह हुआ की कहीं ये भी रावण की ही चाल तो नहीं तब हनुमान ने उन्हें राम की दी हुयी अंगूठी दिखाई जिसे देख कर सीता का संशय जाता रहा।  हनुमान ने सीता को राम का समाचार सुनाया। उह्नोने सीता को समझाया कि जिस प्रकार आप राम के वियोग में दुखी है उसी प्रकार राम  भी आपकी चिंता में दुखी रहते है। सीता ने अपनी चूड़ामड़ी उतारकर हनुमान को दी और कहा की इसे देखते ही राम समझ जायेंगे की तुम मुझसे मिले थे।

अक्षयकुमार का वध एवं हनुमान मेघनाद युद्ध

इसके पश्चात हनुमान भूख शांत करने के लिए अशोक वाटिका से फल खाने लगे तथा शत्रु के बल पराक्रम की जाँच करने के लिए वाटिका के पेड़ उखाड़ -उखाड़ कर फेंकने लगे। यह देख वाटिका के प्रहरी उनको पकड़ने आए तो उनमें से कुछ तो हनुमान से युद्ध में मारे गए और कुछ अपनी जान बचाकर भाग गये।  उह्नोंने जाकर रावण को अशोक वाटिका एक वानर के आने की सूचना  दी। रावण ने हनुमान को पकड़ने के लिए एक बड़ा सैन्य दल भेजा। परन्तु उस दल के सभी राक्षस भी हनुमान के साथ संघर्ष में मारे गए। तब रावण अपने पुत्र अक्षयकुमार को सेना सहित हनुमान को पकड़ने के लिए भेजा। हनुमान ने उसका भी वध कर दिया। इससे रावण बहुत क्रोधित हुआ और उसने अपने महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत मेघनाद को हनुमान को पकड़ने के लिए भेजा। इंद्रजीत भी जब भयंकर युद्ध में हनुमान को पकड़ने में असफल रहा तब उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। हनुमान ने ब्रह्मास्त्र का मान रखते हुए उसमे बंध जाना स्वीकार किया।  मेघनाद के आदेश पर राक्षसों ने हनुमान को राजसभा में प्रस्तुत किया। रावण ने हनुमान से उनका परिचय और आने का कारण पूछा। उह्नोने रावण को  बताया की वो वानर राज सुग्रीव के सेवक और भगवान श्री राम के दूत हैं। उह्नोने रावण से सीता को छोड़ने के लिए कहा अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा। यह सुनकर रावण क्रोध से तिलमिला उठा और उसने अपने सैनिकों को हनुमान का वध करने का आदेश दिया। तब विभीषण ने रावण से कहा की दूत अवध होता है इसलिए रावण को उसका वध नहीं करना चाहिए तथा कोई और सज़ा देकर हनुमान को छोड़ने को कहा। तब रावण ने सैनिकों को तेल में भीगा कपड़ा हनुमान की पूँछ में बांधकर आग लगाने का आदेश दिया।

लंका दहन 

रावण का आदेश पाकर राक्षस तेल में डुबोए कपड़े हनुमान की पूँछ में बाँधने लगे। हनुमान ने अपनी पूँछ इतनी लंबी की , कि ढेर के ढेर कपड़े  पूँछ में लिपट गए। हनुमान को लंका में गली -गली घुमाया जाने लगा। हनुमान प्रसन्न थे कि इस बहाने उन्हें पूरी लंका नगरी देखने का अवसर मिल रहा था। पूँछ में आग लगते ही ,हनुमान ने अपने शरीर का आकार छोटा कर लिया और राक्षसों की पकड़ से छूट निकले। वे एक भवन से दूसरे भवन ,एक अटारी से दूसरी अटारी पर छलाँग लगाने लगे और अपने जलती पूँछ से भवनों में आग लगाने लगे। सारा नगर धू - धू करके जलने लगा। चारो और हाहाकार मच गया। देखते ही देखते सोने की लंका जलकर राख हो गई। इसके बाद हनुमान ने समुंद्र में अपने पूँछ की आग बुझाई। अपने पूँछ की आग बुझाकर हनुमान फिर से छोटे रूप धारण कर सीता के सामने जा पहुँचे। हनुमान ने सीता को प्रणाम किया और उन्हें अनेक प्रकार से धीरज देकर उनसे विदा ली।

हनुमान की लंका से वापसी 

अरिष्ट पर्वत पर चढ़कर हनुमान ने सिंह के समान गर्जना करते हुए छलांग लगाई और तीव्र गति से समुद्र के उत्तरी किनारे की ओर उड़ चले। हनुमान को आते देख अंगद आदि वानरों ने राम और सुग्रीव की जय जयकार करनी शुरू कर दी। हनुमान ने तट  पर उतरकर उनको लंका का सारा हाल बताया। सभी , वानरराज सुग्रीव और राजा राम के पास चल दिए। हनुमान ने सीता की दशा का वर्णन श्री राम से किया तथा सीता द्वारा दी गयी चूड़ामड़ी उनको दिखाई। सीता की कुशलता जानकर राम ने गदगद होकर हनुमान को गले लगा लिया।  चूड़ामड़ी देखकर राम के नेत्रों से अश्रु बहने लगे। राम को इस प्रकार शोक करते देखकर हनुमान ने उन्हें धीरज बँधाया। सुग्रीव ने सेना को लंका की और प्रस्थान करने का आदेश दिया।

रावण द्वारा विभीषण का अपमान 

देखते ही देखते वानरो और भालुओं की एक बड़ी सेना दक्षिण के समुद्र तट पर एकत्रित हुई। राम की सेना के महेंद्र पर्वत पर पहुँचने का समाचार सुनकर लंकावासियों में खलबली मच गई। जिस दिन से हनुमान लंका जलाकर गए थे , तब से राक्षशों में भय सा समा गया था। वे सोचते थे की जिनका एक दूत इतना वीर और बलशाली है और अकेले ही इतना विनाश कर सकता है , तो उसके स्वामी कैसे होंगे और उनके आगमन पर क्या होगा। लंका वासियो के मन की बात विभीषण के मन तक भी पहुंची। अगले दिन सभा में जब रावण अपने पुत्रो , मंत्रियो ,और सेनापतियों के साथ नगर की सुरक्षा के प्रबंध और राम से लोहा लेने के विषय में चर्चा कर रहा था , तब विभीषण ने रावण को सलाह दी कि वह राम से बैर मोल न ले और सीता को राम को लौटकर नगर एवं नागरिको की रक्षा करे। यह सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने विभीषण का त्रिस्कर करते हुए अपशब्द कहे।

विभीषण का राम की शरण में आना 

रावण द्वारा अपमानित होकर विभीषण अपने चार मंत्रियो सहित भगवान् श्री राम की शरण में चला गया। सुग्रीव को उस पर संदेह था की शायद वह रावण का गुप्तचर हो। परन्तु राम ने सुग्रीव को समझाया कि शरणागत की रक्षा करना क्षत्रियों का धर्म है। विभीषण हमारी शरण में आया है ,हम उसे जरूर शरण देंगे। सुग्रीव भी राम की बात से सहमत हो गया। विभीषण ने राम से मिलकर उनको रावण की कई मार्मिक बातें बताईं।



समुन्द्र पर सेतु बांधना 

अब वानर सेना के सामने यह समस्या थी कि समुद्र कैसे पार किया जाए। सबने मिलकर तय किया कि पहले समुद्र से ही मार्ग दे देने की प्रार्थना की जाये। राम तीन दिनों तक उपवास रखकर समुद्र किनारे कुशा बिछाकर समुद्र से रास्ता देने की प्रार्थना करते रहे। जब समुद्र पर उनकी प्रार्थना का कोई असर नहीं हुआ तो राम क्रोधित हो उठे और उह्नोने समुद्र को सुखा देने के लिए धनुष उठाकर उस पर बाण चढ़ा दिया। यह देख समुद्र मानव रूप में उनके सामने प्रकट हुआ तथा उनसे क्षमा माँगने लगा। समुद्र ने राम को बताया कि उनकी सेना में नल  और नील नाम के दो वानर ऐसे हैं ,  जिनके हाथ  लगने से पत्थर पानी पर तैरेंगे और कहा कि राम कृपया नल और नील की सहायता से उस पर पुल बाँधें। समुन्द्र ने राम से बाण को एक ऐसी दिशा में छोड़ने के लिए कहा जहां दुष्ट लोग रहा करते थे । राम ने समुद्र का आग्रह स्वीकार किया। उनके बाण से उस क्षेत्र में दुष्टों का नाश हो गया। नल और नील ने समुद्र पर पुल बनाना शुरू किया। बाकी वानर भालू भी राम का नाम लिखकर पानी में पत्थर फैंकने लगे। आश्चर्य जनक रूप से वे पत्थर भी पानी पर तैरने लगे। शीघ्र ही लंका तक का पुल बँधकर तैयार हो गया। वानर सेना पुल  की सहायता से समुद्र पार कर लंका पहुँच गयी।



रावण द्वारा राम की सेना में गुप्तचर भेजना 

राम की सेना को लंका के द्वार पर आया देख रावण हैरान रह गया। उसने राम की शक्ति का पता लगाने के लिए शुक और सारण नाम के दो गुप्तचरों को भेजा। वे दोनों वानर रूप में राम की सेना में पहुँच गए लकिन विभीषण ने उनको पहचान लिया और उनको पकड़ कर राम के पास ले गए। राम ने उनका परिचय पूछा तो उह्नोंने साफ़ साफ़ अपना नाम और आने का उद्शेय बता दिया। राम ने मुस्कुराकर शुक और सारण को विभीषण की सहायता से और भी जानकारी ले लेने को कहा। यह कहकर राम ने विभीषण से दोनों को छोड़ देने के लिए कहा। शुक और सारण ने वापस  पहुंचकर  रावण के सामने राम की बहुत प्रशंसा की। जिसे सुनकर रावण बहुत क्रोधित हुआ। उसके बाद रावण उन्हें महल की सबसे ऊँची अटारी पर ले गया , जहा से राम की सेना का दृश्य  बिलकुल साफ दिखाई देता था। रावण ने उन्हें राम की सेना का परिचय देने को कहा। शुक और सारण  ने उन्हें राम की सेना के सभी वीरो की जानकारी दी। उह्नोने रावण को विभीषण के राज्याभिषेक के बारे में भी बताया। 

अंगद का धरती में पैर जमाना 

अगले दिन सुबह राम ने अपनी सेना को चार भागो में बांटा और प्रतयेक दाल को लंका के एक -एक द्वार पर आक्रमण करने का आदेश दिया। युद्ध छेड़ने से पहले राम ने अंतिम बार शांति का का प्रयास किया और अंगद को दूत बनाकर लंका जाने का आदेश दिया। राम ने अंगद से कहा की वह जाकर एक बार फिर रावण को समझाए कि सीता को लौटा देने से ये युद्ध टाला जा सकता है। अंगद वायु मार्ग से सीधा लंका रावण की राज्यसभा में जा पहुंचे।  उन्होंने रावण को अपना परिचय दिया तथा राम का सन्देश सुनाया। रावण ने अंगद को धिक्कारते हुए कहा कि जिसने उसके पिता का वध कर दिया वह ह उसी का पक्ष ले रहा है। यदि वह अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहता है तो उसे रावण का पक्ष लेना चाहिये। इसके पश्चात् रावण ने अपने सामने राम की शक्ति को तुच्छ बताया जिससे क्रोधित होकर अंगद ने भूमि पर अपना पैर जमाया और कहा , "दुष्ट रावण श्री राम प्रभु का युद्ध में सामना करना तो दूर , तू या तेरी सभा में से कोई भी मेरे इस पैर को भूमि पर से उठा सके तो ही में तेरी  शक्ति को मानूंगा।" इसके बाद मेघनाथ सहित रावण के सभा के सभी सदस्यों ने अंगद का पैर उठाने की कोशिश की परन्तु कोई भी सफल न हो सका। अंत में स्वयं रावण प्रयास करने आया तब अंगद ने अपना पैर उठाते हुए रावण से कहा ,"मूर्ख यदि पैर ही पड़ना है तो प्रभु श्री राम के पड़। हो सकता है वो तुझे क्षमा कर दें।  इसके बाद अंगद आकाश मार्ग से उड़ कर वापस आ  गया और राज्य सभा की सभी बातें विस्तार से राम को बताईं। शांति प्रयास विफल होने के पश्चात युद्ध निश्चित हो गया।

युद्ध आरम्भ और राम और लक्ष्मण का नागपाश में बंधना 

राम ने लंका पर आक्रमण  करने का आदेश दिया। वानर सेना ने चारो द्वारों से लंका पर चढाई कर दी। आक्रमण के उत्तर में रावण ने द्वार खोलने का आदेश दे दिया और उसकी चतुरंगिणी सेना वानर सेना पर टूट पड़ी। वानर राक्षसों पर वृक्ष और पत्थरों  की वर्षा करने लगे। वे अपने दांतो और नाखूनों से राक्षसो पर प्रहार करने लगे और परकोटो पर चढ़कर राक्षसो को उठाकर नीचे फेंकने लगे। राक्षस गदाओं , शूल और फरसों से आक्रमण कर रहे थे।  दोनों पक्षों में घमासान युद्ध होने लगा। शाम होने लगी तो मेघनाद ने राक्षसों की ओर से भयंकर आक्रमण किया। वह अदृश्य होकर युद्ध करने लगा। उसने नाग बाण चलाए जिससे आहत होकर राम -लक्ष्मण बेहोश होकर गिर पड़े। वानर सेना में कोहराम मच गया। मेघनाद विजयध्वनी करता हुआ रावण के पास पहुंचा और उसे राम लक्ष्मण के मारे जाने का समाचार दिया। राम - लक्ष्मण को नागपाश में बंधा देख हनुमान समझ गए कि इस नागपाश की तोड़ केवल पक्षीराज गरुण के पास है। हनुमान जी ने गरुण के पास जाकर उनसे राम और लक्ष्मण का नागपाश खोलने की प्रार्थना की।  गरुण ने आकर राम -लक्ष्मण को नागपाश से मुक्ति दिलाई। वानर सेना में ख़ुशी की लेहेर दौड़ उठी। राम लक्ष्मण के स्वस्थ  होने का समाचार सुनकर रावण चिंतित हो उठा। उसने धूम्राक्ष को विशाल सेना लेकर भेजा। हनुमान ने धूम्राक्ष को मार गिराया। फिर वज्रदंष्ट्रा मैदान में आया। अंगद ने उसका वध कर दिया।  फिर रावण ने अकम्पन को युद्ध के लिए भेजा।  हनुमान ने एक बड़े वृक्ष से कुचल कर उसका वध कर दिया। अकम्पन के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण बहुत क्रोधित हो उठा और उसने अपने सेनापति प्रहस्त्र को युद्ध के लिए भेजा। नील और प्रहस्त्र में घनघोर युद्ध हुआ अंततः नील ने प्रहस्त्र का वध कर दिया।

रावण का युद्ध में आगमन 

प्रहस्त्र के वध से व्याकुल रावण बहुत सारे राक्षस वीरों के साथ युद्ध क्षेत्र में आ पहुँचा। उसे देखते ही सुग्रीव ने बड़ी सी शिला उठाकर रावण पर फेंकी । रावण ने अपने बाणों से उसके टुकड़े -टुकड़े कर दिए।  सुग्रीव उसके बाणों  से मूर्छित हो गया। वानर सेना में हाहाकार मच गया। यह देख हनुमान और लक्ष्मण रावण से युद्ध करने के लिए आगे आये। हनुमान ने रावण को ऐसा मुक्का मारा की रावण के पैर डगमगा गए।  वह हनुमान की प्रशंसा किये बिना न रह सका। फिर लक्ष्मण और रावण में युद्ध शरू हो गया। दोनों महाबली एक दूसरे पर भयंकर आक्रमण करने लगे। कभी लक्ष्मण का पलड़ा भारी होता तो कभी  राम का। यह देख राम स्वयं रावण से युद्ध करने के लिए आगे आये। उह्नोंने अपने अर्धचन्द्र बाण के प्रहार  से रावण का मुकुट और रथ काट डाला। रावण का मुकुट धरती पर जा गिरा। राम ने कहा ,"रावण जाओ मैं तुम्हें छोड़ता हूँ , क्योंकि मैं निहत्ते और निशस्त्र पर बाण नहीं चलाता। अस्त्र शस्त्र लेकर नए रथ में बैठकर युद्ध के लिए आना।" निराशा में डूबा रावण लंका लौट गया।

कुम्भकरण वध 

लंका में पहुंचकर चिंता में डूबा रावण राम को पराजित करने के तरीके सोचने लगा।  तभी उसे अपने भाई कुम्भकरण की याद आई।  कुम्भकरण  एक विशाल काया वाला बलशाली योद्धा था। वह छह महीने के बाद एक दिन के लिए ही जागता था और खा पी कर फिर सो जाता था। रावण ने बहुत सारे खाने पीने के सामान के साथ राक्षसो की टोली उसे जगाने  के लिए भेजी।  उह्नोंने उसके कान पर ढोल नगाड़े बजाकर उसके शरीर को झकझोरकर किसी तरह उसको जगाया और उससे रावण के पास चलने का अनुरोध किया। वह रावण के पास पहुंचा और उसे जगाए जाने का कारण पूछने लगा।  रावण ने उसे सारा हाल सुनाया और उससे युद्ध में जाने के लिए कहा। तब कुम्भकरण ने रावण से कहा कि जनकपुत्री सीता का हरण करके उसने बड़ी भूल की है। बुरे काम का बुरा फल ही होता है। जो किया है उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा। कुम्भकरण का उपदेश सुनकर रावण क्रोधित हो गया और बोला कि उपदेश छोड़कर राम को पराजित कर मुझे संकट से मुक्ति दिलाओ। कुम्भकरण ने रावण को धीरज बंधाया और युद्ध के लिए चल दिया। विशालकाय कुम्भकरण हाथ में त्रिशूल लिए रण भूमि में पहुंचा।क्रोध से भरा कुम्भकरण वानरों को रोंदने लगा। वानर कुम्भकरण पर बड़े बड़े वृक्ष और शिलाऐं फेकते पर कुम्भकरण पर उसका जरा सा भी प्रभाव नहीं पड़ता। अंततः वानर भयभीत होकर भागने लगे। तब हनुमान , अंगद और सुग्रीव ने कुम्भकरण को रोकने की कोशिश की। परन्तु वे भी विफल रहे। बड़े बड़े वानर योद्धाओं की यह दशा देखकर लक्ष्मण  कुम्भकरण से युद्ध करने लगे। लक्ष्मण ने उसपर तीखे बाणों की बौछार कर दी। कुम्भकरण लक्ष्मण की वीरता से बड़ा प्रभावित हुआ और उनकी प्रशंसा करते हुए बोला कि वह लक्ष्मण से नहीं राम से युद्ध करना चाहता है। तब राम युद्ध के लिए आगे आए।  दोनों में भयंकर लड़ाई होने लगी। तब राम ने एक दिव्य बाण चला कर उसकी दायनी भुजा काट दी। क्रोधित हो कुम्भकरण अपने बाये हाथ से एक विशाल वृक्ष उखाड़ कर राम को मारने दौड़ा। राम ने अपने बाण से उसकी दूसरी भुजा भी काट दी। भयानक गर्जना करता हुआ कुम्भकरण मुँह फाड़े राम को खाने दौड़ा। राम ने बाण से उसके दोनों पैर भी काट डाले। कुम्भकर्ण धरती पर गिर पड़ा तब राम ने एक बाण चला कर उसकी गर्दन काट डाली।

लक्ष्मण पर मेघनाद का शक्ति प्रहार 

कुम्भकर्ण के वध से रावण निराशा के अंधकार में डूब गया। तब रावण के पुत्र त्रिशरा ,देवान्तक और नरान्तक ने रावण को धीरज  बनाया और युद्ध भूमि में जाने की आज्ञा मांगी। नरान्तक अंगद से घनघोर युद्ध में मारा गया। हनुमान ने देवान्तक का वध कर दिया। त्रिशरा भी हनुमान के हाथों मारा गया। अब अतिकाय नामक राक्षस युद्ध के लिए सामने आया। वे कुम्भकर्ण की भांति विशाल और बलशाली था। उसे ब्रह्मा से कई शक्तियां प्राप्त थीं। लक्ष्मण ने अतिकाय को रोका। लक्ष्मण और अतिकाय में युद्ध होने लगा। ब्रह्मा की शक्तियों के कारण उसपर लक्ष्मण के बाणों का कोई असर नहीं हो रहा था । यह देख लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र चलाकर अतिकाय का वध कर दिया। पुत्रों  और बंधु - बांधवों का अंत देखकर रावण पूरी तरह टूट गया। रावण को शोक मग्न देखकर उसका पुत्र मेघनाद उसे समझाने लगा और हौसला देते हुए बोला ," पिताजी ,मेरे रहते आप चिंता क्यों करते हैं ? मैं  शीग्र ही राम लक्ष्मण को मार दूंगा। " मेघनाद की शक्ति से रावण अच्छी तरह परिचत था। उसने मेघनाद को युद्ध में जाने की आज्ञा दे दी। रथ पर चढ़कर, दिव्य अस्त्र -शास्त्रों से सुसज्जित होकर मेघनाद रणक्षेत्र में पहुंचा। मेघनाद का लक्ष्मण से युद्ध आरम्भ हो गया। तब मेघनाद ने लक्ष्मण के ऊपर अमोघशक्ति का उपयोग किया। शक्ति के प्रभाव से लक्ष्मण मूर्छित हो गए। लक्ष्मण को मूर्छित देख सभी चिंचित हो उठे। किसे को कुछ भी नहीं सूझ रहा था।  लक्ष्मण को मूर्छित देख राम का रो रो कर बुरा हाल था। तब विभीषण की सलाह से हनुमान उड़कर लंका में गए और लंका से सुषैण वैध को उसके घर सहित उठा ले आये। विभीषण ने सुषैण वैध से लक्ष्मण का उपचार करने की प्रार्थना की। लक्ष्मण को शत्रु जान सुषैण वैध ने उपचार करने से मना कर दिया। तब राम ने सुषैण वैध को वैध धर्म याद दिलाकर उपचार करने की प्रार्थना की। तब सुषैण वैध ने राम की बातो से प्रभित होकर कहा कि यदि सूर्य उदय से पहले हिमालय से संजीवनी बूटी  लायी जा सके तो लक्ष्मण का उपचार का संभव है। यह सुन हनुमान ने संजवानी बूटी  की पहचान पूछी। सुषैण वैध ने हनुमान को बताया कि संजवानी बूटी चमक रही होगी। यह सुन हनुमान हिमालय की ओर उड़ चले । उधर जब रावण को जब यह बात पता चली तो उसने हनुमान को रोकने के लिए कालनेमि नामक राक्षस को भेजा। कालनेमि अपनी माया से हनुमान के रास्ते में एक पर्वत पर साधु बनकर बैठ गया और राम नाम का जाप करने लगा। हनुमान राम नाम का जाप सुनकर उसके पास पहुंचे। उसने हनुमान को अपनी बातों के झांसे में फंसा लिया और थोड़ा विश्राम करने की सलाह दी। हनुमान जब थकान उतारने के लिए पास ही एक तालाब में स्नान करने के लिए गए तो एक मादा मगरमच्छ ने उनपर आक्रमण कर दिया। हनुमान ने उसे मार डाला। वह मादा मगरमच्छ एक दिव्य स्त्री के रूप में प्रकट हुई और उसने हनुमान को बताया कि वह  एक श्राप के कारण मगरमच्छ बन गयी थी और हनुमान ने उसे मारकर उसे श्राप मुक्त कर दिया है। उसने यह भी बताया कि वह साधु कोई और नहीं रावण का भेजा हुआ राक्षस है जो हनुमान को उनके मंतव्य से भटका रहा है। यह जान हनुमान ने कालनेमि का वध कर दिया और आगे उड़ गए। हिमालय पहुँचकर हनुमान ने देखा कि दिव्य जड़ी बूटियों से एक पूरा पर्वत ही चमक रहा है। वे संजवनी बूटी को पहचान न सके और पूरा पर्वत  ही उठा लाये। जब हनुमान पहाड़ लेकर अयोध्या के ऊपर से निकले तब एक प्रहरी ने भरत को यह बात बताई।  भरत ने मायावी राक्षस जान हनुमान के ऊपर तीर चला दिया। तीर लगने से हनुमान श्री राम श्री राम कहते हुए पर्वत सहित धरती पर आ गिरे। हनुमान के मुँह से राम नाम का जाप सुन भरत को आश्चर्य हुआ। दोनों में परिचय का आदान प्रदान हुआ। दोनों ने एक दूसरे को गले से लगाया। तब हनुमान ने भरत को राम और रावण के युद्ध के विषय में बताया सुनकर भरत आवेश में आ गए और अपनी सेना लेकर राम की सहायता के लिए चलने को तत्पर हो गए। हनुमान ने उन्हें  स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया और पर्वत लेकर लंका की और उड़ चले। हनुमान के लंका पहुंचने पर सुषैण वैध ने सांजवणी बूटी की सहायता से लक्ष्मण को ठीक कर दिया। जय श्री राम के जय घोष से आसमान गूँज उठा। 

मेघनाद वध 

अगले दिन युद्ध में जाने से पहले मेघनाद एक गुप्त स्थान पर निकुंबला देवी के मंदिर में यज्ञ करने गया। यज्ञ पूरा होने पर उसे मारना असंभव हो जाता। विभीषण के गुप्तचरों ने उसे इस बात की सूचना दी। विभीषण से सूचना पाकर राम की आज्ञा से लक्ष्मण , विभीषण और वानर सेना को साथ लेकर यज्ञ स्थान पर पहुंचे। वह पहुंचकर लक्ष्मण और वानर सेना ने यज्ञ का विध्वंस कर डाला। यह देख मेघनाद विभीषण को अपशब्द कहने लगा। उसने विभीषण को कुलद्रोही और देशद्रोही की संज्ञा भी दी। लक्ष्मण और मेघनाद के बीच भयानक युद्ध छिड़ गया। लक्ष्मण ने महर्षि विश्वामित्र द्वारा दिए गए ऐन्द्रास्त्र को चलाकर मेघनाद का वध कर दिया। लक्ष्मण की बहादुरी की कथा सुनकार राम बहुत प्रसन्न हुए।

राम रावण युद्ध 

मेघनाद की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण क्रोध से भर उठा और बची हुई सेना को एकत्रित कर युद्ध भूमि की और चल पड़ा। रास्ते में अनेक प्रकार के अपशगुन होने लगे। उसने सभीअपशगुनों को अनदेखा कर दिया।  युद्ध भूमि पहुंचते ही उसने वानर सेना का नाश करना शुरू कर दिया। यह देखकर राम रावण से युद्ध करने के लिए आगे आए। युद्ध में रावण ने राम को भी  घायल  कर दिया , तब राम ने रावण को ललकारते हुए कहा ,"हे रावण आज तेरा अंत निश्तित है , तेरा काल ही मुझे तेरे सामने ले आया है। आज ये धरती तेरे बोझ से मुक्त हो जाएगी।" राम ने रावण पर भीषण बाणो की वर्षा शुरू कर दी। रावण अपने सुसज्जित रथ पर बैठकर युद्ध कर रहा था , जबकि राम रथ हीन थे। यह देख देवराज इंद्र ने अपने सारथि मातलि के साथ अपना रथ राम के लिए भेजा। राम इंद्र के रथ पर चढ़कर युद्ध करने लगे। दोनों महावीर एक दूसरे पर भयंकर शक्तियों का उपयोग करने लगे। राम को चिंता हो उठी कि जिन बाणो से उह्नोंने खर दूषण और बाली जैसे योद्धाओं को मारा था उनका रावण पर कोई प्रभाव नहीं हो रहा था। उनके बाण से जबभी रावण का सर कटता तब दूसरा सिर प्रकट हो जाता। तब विभीषण ने राम को बताया कि रावण की नाभि में अमृत कलश है,  यदि राम रावण की नाभि में शक्ति बाण मार सकें तो अवश्य ही रावण मारा जाएगा। राम ने ऐसा ही किया। राम का शक्ति बाण रावण की नाभि में लगते ही रावण के हाथ से धनुष छूट गया और वह रथ से लुढ़ककर धरती पर जा गिरा। देवताओं की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं रहा। राम की स्तुति करते हुए वे आकाश से फूलों की वर्षा करने लगे। वानर सेना ने राम की जय जय कार से सारी  पृथ्वी और आकाश को गूंजा दिया।  

रावण वध के पश्चात् सोने की लंका की ओर कोई मोह न दिखाते हुए राम ने विभीषण को लंका के सिंहासन पर आसीन किया और स्वयं सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट गए।  



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Moral of the Story for Kids : 1. जैसे को तैसा। 2. सेर को सवासेर मिल ही जाता है। 3. स्याना कौवा हमेशा गोबर में ही मुँह मारता है। 


(Hindi Story - Underwear Worth Rupees Ten Thousand

Hindi Moral Story - दस हजार का कच्छा

एक युवक था।  वह बहुत शरारती था और दूसरों को तंग करने में उसे बड़ा आनंद आता था। एक बार जब वह अपने खेत से काम कर के लौट रहा था , तो रास्ते में उसे बाजार से गुजरते समय एक दुकानदार से शरारत करने की सूझी। बस फिर क्या था, ऐसा विचार मन में आते ही उसके पैर मुड़ चले एक दुकान की ओर। वह एक कपड़े की दुकान थी। दुकान पर कई ग्राहक मौजूद थे। जाते ही युवक ने बाकी ग्राहकों की बारी की परवाह किये बगैर कहा , "मुझे वो चाहिए , जरा दिखाना। " नवयुवक की बात सुनकर दुकानदार का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुआ और उसने पूछा , "अरे भई , वो क्या , नाम बताओ। " नवयुवक फिर बोला , "वो। " दुकानदार को लगा कि शायद नवयुवक को बोलने में कुछ तकलीफ है तो उसने , जिस ओर वो युवक देख रहा था , उस ओर एक वस्तु की ओर इशारा करके पूछा , "क्या ये चाहिए ?" युवक बोला , "ये नहीं वो। " दुकानदार ने दूसरी चीज की ओर इशारा करके पुछा , "क्या ये ?" युवक फिर बोला , "नहीं नहीं ये नहीं वो....वो । " दुकानदार एक एक करके कई चीजों की ओर इशारा करता गया और युवक "ये नहीं वो" बोलता रहा।  सभी लोग युवक की हरकत को कौतुहल से देख रहे थे और सोच रहे थे कि आख़िरकार युवक क्या चाहता है। आखिरकार दुकानदार खीज उठा और बोला , "भाई जो तुम माँग रहे हो वो मेरे पास नहीं है। " युवक, जो पहले ही दुकानदार की मनोदशा देखकर मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहा था , बोला , "कोई बात नहीं, मैं कल इसी समय दुबारा 'वो' लेने आऊंगा , आप 'वो' मंगा कर रखना। " यह कहकर युवक अपनी शरारती हँसी हँसता हुआ चला गया। दुकानदार सोच में पड़ गया कि ना जाने वो युवक क्या मांग रहा है और कल पता नहीं वो उस युवक को दुबारा कैसे झेलेगा। 

अगले दिन नियत समय पर युवक उस दुकान पर पहुँच गया।  आज कुछ अधिक ही ग्राहक दुकान पर मौजूद थे। जिसमें से कुछ तो वास्तविक ग्राहक थे और कुछ कल वाले ही थे जो केवळ यह देखने आये थे कि युवक का 'वो' से क्या मतलब है। उधर दुकानदार भी पहले से तैयार था। वो सोच रहा था कि अवश्य ही युवक कोई ऐसा कपडा मांग रहा है जो उसकी दुकान में नहीं है। ग्राहक का खाली हाथ लौटना उसको बिल्कुल पसंद न था। इसीलिए वो आज कई और तरह के वस्त्र भी दुकान पर लाया था। महिलाओँ और बच्चों के भी नए प्रकार वस्त्र वो दुकान पर लाया था। क्या पता युवक अपने लिए नहीं , बल्कि अपनी पत्नी या बच्चों के लिए वस्त्र ढूंढ रहा हो। बस फिर क्या था , एक बार फिर से युवक और दुकानदार के बीच 'वो वो ' का क्रम चल पड़ा। युवक को तो कुछ खरीदना था नहीं , इसीलिए वो दुकानदार की दिखाई हर चीज को अस्वीकृत करके 'वो' दिखाने की मांग रख देता था। ऐसा करते हुए युवक मन ही मन आनंदित होता था। लोग भी कल की ही भांति 'वो' का मतलब जानने के लिए बहुत उत्सुक थे और जिज्ञासा वश दुकानदार के प्रयत्न को देख रहे थे। 

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आख़िरकार काफी मेहनत के बाद दुकानदार थक गया और वो समझ गया कि युवक को कुछ नहीं चाहिए और युवक केवल उसको परेशान कर रहा है। परन्तु उसने अपने चेहरे पर ऐसा कोई भाव नहीं आने दिया जिससे युवक को आशंका हो कि दुकानदार युवक की शरारत समझ गया है।  तब दुकानदार ने युवक को बोला , "बस श्रीमान , मैं समझ गया आपको कैसा कपडा चाहिए।  आप अवश्य ही एक ऐसा अनोखा कपड़ा ढूंढ रहे हैं , जो आज तक किसी ने देखा ही ना हो। आप मुझे कल तक का समय दें तो मैं आपको ऐसा कपड़ा लाकर अवश्य दे सकता हूँ , जिसे आज तक किसी ने ना देखा हो।  परन्तु मेरी एक शर्त है। ऐसा कपडा ढूंढ़ने के लिए मुझे काफी श्रम करना पड़ेगा और मेरा काफी पैसा भी खर्च हो जायेगा। इसलिए 'वो' कपडा थोड़ा ज्यादा ही महंगा होगा। यदि आपकी खरीदने की मंशा और औकात हो , तभी मैं लाऊं ?" ऐसा कहकर दुकानदार ने चुपचाप से गेंद युवक के पाले में डाल दी और स्वयं मन ही मन मुस्कुराने लगा। दुकानदार की बात सुनकर , सब लोग युवक की ओर देखने लगे , कि युवक अब क्या उत्तर देगा। युवक सोच रहा था कि शायद उसकी ' वो ' की मांग सुनकर दुकानदार का मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है इसीलिए उसने 'वो' कपडा लाकर देने की बात कही है जो आजतक किसी ने नहीं देखा। " युवक बोला , "हाँ हाँ , वो ही कपड़ा जो आजतक किसी ने ना देखा हो। आप बिल्कुल चिंता न कीजिये , मैं 'वो' जरूर खरीदूंगा , चाहें कितना भी महंगा क्यों ना हो। मैं कल इसी समय आऊंगा , आप मंगा कर अवश्य रखना " यह कहकर युवक चला गया। आज युवक और दुकानदार दोनों मन ही मन प्रसन्न थे। 

अगले दिन नियत समय पर युवक दुकान पर आ गया।  आज दुकान पर पहले से भी अधिक लोग मौजूद थे , तमाशबीन ज्यादा और ग्राहक कम। युवक को आया देख तमाशबीनों ने रास्ता छोड़ दिया और जो वास्तविक ग्राहक , युवक और दुकानदार के बीच अड़े थे उनको भी तमाशबीनों ने बीच में से एक तरफ खींच लिए। युवक को आया देख दुकानदार बहुत प्रसन्न हुआ और बोला , "आइए  आइए , मैं आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। बस कुछ क्षण का समय दीजिये , मैं अभी वो लेकर आता हूँ।" कहकर दुकादर दुकान के भीतर गया और जब लौटा तो उसके दोनों हाथ इस मुद्रा में थे जैसे कि उसने दोनों हाथों से कोई कपड़ा पकड़ रखा हो।  परन्तु कपड़ा तो कोई दिखाई नहीं दे रहा था। सभी आँखे फाड़ फाड़ कर देख रहे थे। दुकानदार बोला , "श्रीमान जी , ये लीजिये आपका 'वो' , ये अनोखा कच्छा आज तक किसी ने नहीं देखा। मेरे बाद इसको देखने वाले आप दूसरे हैं।  यह इतना आरामदायक है कि इसको पहन कर आपको एकदम खुला खुला लगेगा , यह बहुत हवादार भी है , इसमें आप बहुत हल्का महसूस करेंगे। बस इसकी कीमत थोड़ी ज्यादा है , मात्र दस हजार रुपये। पर यकीन मानिये , यह आप पर बहुत जंचेगा।  बल्कि यूँ जानिए कि यह पहन कर आपको कुछ और पहनने की जरूरत ही नहीं होगी , आपको देखने के लिए लोगों की भीड़ जमा हो जाएगी। मूत्र और शौच के लिए भी आपको इसको उतारने की जरुरत नहीं पड़ेगी।  " दुकानदार की बातें सुनकर सभी उस अनोखे , गुणों की खान , ना दिखाई देने वाले कच्छे को आंखें फाड़ फाड़ कर देखने लगे।  

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युवक को भी वह दस हजार का कच्छा बहुत अच्छा लगा , इतनी सारी विशेषताएं जो थीं उस न दिखाई देने वाले कच्छे में।  और फिर उसने कल 'वो' (कपडा जो न दिखाई दे) खरीदने की हामी भी तो भरी थी, सबके सामने।  उसे लगा की यदि वो 'वो' कच्छा नहीं खरीदेगा तो लोगों के सामने बहुत बेज्जती होगी। उसने तुरंत ही जेब से दस हजार रूपए निकाल कर दुकानदार के हाथ में दस हजार रूपए रखे और कच्छे को अच्छे से पैक करके देने के लिए कहा।  दुकानदार ने दस हजार रूपए लपकते हुए कहा , अरे श्रीमान यह आप क्या कर रहे हैं ? इतने महंगे कपड़े को पैक करवा रहे हैं।  इसे तो आपको तुरंत पहनकर दुनिया को दिखाना चाहिए। इसमें आपका व्यक्तित्व बहुत निखर जायेगा।  इतना महंगा कच्छा सारे शहर में किसी के पास नहीं होगा। लोग जब आपको इसको पहने देखेंगे तो आपसे जलेंगे।"  युवक को दुकानदार की बात अच्छी लगी। युवक ने दुकानदार के हाथों से बड़ी सावधानी से वह कच्छा पकड़ लिए और पूछा , "कपडे बदलने का कमरा कहाँ है ?" दुकानदार ने एक कमरे की ओर इशारा कर दिया। युवक उस कमरे में गया और अपने कपड़े उतारकर , बस वह कच्छा पहनकर आ गया। जब वो दस हजार रूपए का ना दिखाई देने वाला कच्छा पहनकर निकला तो उसने देखा कि दुकान के बाहर उसका कच्छा देखने वालों की भीड़ बढ़ गयी थी। सब उसके कच्छे की ओर ही देख रहे थे और मुस्कुरा रहे थे। बच्चे तो चिल्ला चिल्ला कर तालियां भी बजा रहे थे। अपने कच्छे की इतनी प्रसिद्धि देखकर उसको बड़ा अच्छा लगा।  वो घूम घूम कर लोगों को अपना कच्छा सभी ओर से दिखा रहा था और कहता जा रहा था , "देखो देखो , कैसा लग रहा हूँ ? दस हजार का कच्छा है।  बहुत ही आरामदायक है , ऐसे लगता है जैसे कुछ पहना ही ना हो। " तभी उसे याद आया कि उसे अपनी पत्नी को लाने के लिए ससुराल जाना था। यह विचार आते ही उसने दुकानदार को कच्छे के लिए ह्रदय से धन्यवाद दिया और निकल पड़ा ससुराल की ओर। वो जहाँ से भी निकलता , लोग उसके कच्छे को घूर घूर कर देखते और आपस में बातें करते। यहाँ तक की कुत्ते भी उसके कच्छे को देखकर उसके ऊपर भौंक रहे थे। उसे बड़ा अच्छा लग रहा था।  उसके दस हजार के कच्छे ने उसे एक विशिष्ठ व्यक्ति बना दिया था। 

युवक ने ससुराल पहुंचकर दरवाजे पर दस्तक दी। सासु जी ने दरवाजा खोला। दामाद जी को आया देख उनको प्रसन्नता हुई।  पर उनकी यह प्रसन्नता क्षणिक ही थी। दामाद जी के वस्त्रों को नदारद पाकर , वो सन्न रह गयीं। उन्हें पता ही नहीं चला कि दामाद जी ने कब उन्हें प्रणाम किया। वो जवाब देना भूल गयीं। सासु जी की ऐसी हालत देखकर , दामाद जी ने हँसते हुए कहा , "देखिये , देखिये , सासु माँ आप भी देखिये , दस हजार का है ये मेरा नया कच्छा , एकदम खुला खुला, हल्का और हवादार। " यह कहकर युवक घूम घूम कर अपनी सास तो अपना १० हजार रूपये का कच्छा दिखाने लगा। सासु जी अपने दामाद की ऐसी हरकतें देखकर अवाक् रह गयीं। वो समझ नहीं पा रहीं थीं कि वो इस अजीब परिस्तिथि में कैसा बर्ताव करें।  तभी उनके पति के 'कौन आया है ' के स्वर उनके कानों में पड़े और वो दरवाजे से एक तरफ हट गयीं , जिससे कि दामाद जी अंदर आ सकें और ससुर जी से मिल सकें।  ससुरजी की आवाज सुनकर युवक अंदर की ओर लपका और उसने ससुर जी को प्रणाम किया। दामाद की स्तिथि देखकर ससुर जी की हालत भी वैसी ही हो गयी जो थोड़ी देर पहले सासु जी की थी। जीजाजी की आवाज सुनकर , साले सालियाँ भी दौड़े चले आये , लेकिन जीजाजी को देखकर उनके पैर भी दूर ही ठिठक गया। युवक बोला , "अरे , आओ आओ , वहीं क्यों रुक गए , पास से देखो , दस हजार का कच्छा है , एकदम खुला , हवादार और आरामदायक। " यह कहकर युवक अपने ससुर जी और साले सालियों को घूम घूम कर अपना कच्छा दिखाने लगा। ससुर जी ने आखों के इशारों से ही बच्चों को जीजाजी पर हंसने से रोक दिया था। समझ में तो उनको भी कुछ नहीं आया , पर वो दामाद जी को रुष्ट नहीं करना चाहते थे , इसीलिए वो अपनी पत्नी सहित , दामाद जी की सेवा में लग गए। वो सोच रहे थे कि वैसे तो महीना नवम्बर का चल रहा था पर शायद उनके दामाद जी को गर्मी ज्यादा लग रही हो।  वो चाहते थे कि उनकी बेटी जो अपनी सहेली के घर से अगली सुबह आने वाली थी , आ जाये , और वो शांति से अपनी बेटी को दामाद जी दे साथ विदा कर दें। फिर बेटी जाने और दामाद जी जानें।  यही सोचकर दामाद जी की अवस्था तो नजरअंदाज किया गया और सारा घर उनकी सेवा में लग गया। 

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रात हुई तो सोने के लिए , सासु जी ने दामाद जी की खाट (चारपाई) , ससुर जी के कमरे में डाल दी , नवम्बर का महीना चल रहा था।  दिन में तो मौसम ठीक था पर रात में कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी , इसलिए रजाई भी रख दी। घर के अंदर बिस्तर लगा देख युवक बिगड़ गया।  वो तो अपना दस हजार का कच्छा सबको दिखाना चाहता था।  उसने अपनी खाट घर से बाहर बिछाने को कहा। सुनकर सासु जी जो गुस्सा तो बहुत आया , पर जब उन्होंने ससुर जी की और देखा , जो आँखों के इशारों से कह रहे थे कि , जैसा यह कह रहा है वैसा ही करो , तो उन्होंने युवक की खाट घर के बाहर बिछा दी।  युवक को तो सबको अपना कच्छा दिखाने का शौक था , इसलिए उसने रजाई ना ओढ़ कर सोने का निर्णय लिया और रजाई भी हटवा दी। सासु जी चुपचाप रजाई भी अंदर ले गयीं। उन्होंने बच्चों को कह दिया कि , जीजाजी का ध्यान रखना , अगर वो किसी चीज के लिए आवाज लगाएं तो तुरंत लाकर देना।

दामाद जी को आया देखकर और घर के बाहर सोता देख गाँव के कुछ लोग भी बातचीत करने के लिए इकट्ठे हो गए।  युवक तो इसी मौके के लिए बाहर सोया था । लोगों को आया देखकर वह बहुत खुश हुआ। उसने सबको अपने दस हजार के कच्छे के बारे में विस्तार से बतलाया। सब उसका दस हजार का कच्छा देखकर बहुत मुस्कुरा रहे थे और उसके विषय में ही फुसफुसाकर बातें कर रहे थे। धीरे धीरे सब अपने घर चले गए। युवक भी सोने की कोशिश करने लगा। ठण्ड बहुत ज्यादा थी। कमरे के अंदर भी रजाई के लायक ठण्ड थी , और वो तो बाहर खुले में सो रहा था। आखिरकार जब ठण्ड सहन नहीं हुई तो उसने अपने साले सालियों को आवाज लगायी। जीजाजी की आवाज सुनकर साले सालियाँ भागे चले आये। युवक ने साले सालियों को आया जानकर , आधी नींद में ही उनसे रजाई लाने के लिए कहा। साले सालियाँ भागकर रजाई लाने के लिए घर के अंदर गए। वहां उन्होंने सोचा की शायद उन्होंने गलत सुन लिया है। जीजाजी को तो आज दिन में इतनी गर्मी लग रही थी कि उन्होंने कपड़े भी नहीं पहने थे , फिर वो रजाई क्यों मागेंगे , अवश्य ही वो ठन्डे पानी से नहाना चाहते होंगे और बाल्टी भरकर ठंडा पानी मांग रहे होंगे।  यही सोचकर वो सभी एक एक ठन्डे पानी की बाल्टी भरकर जीजाजी के पास पहुंचे और बोले , "ये लो जीजाजी , हम ले आये हैं। " युवक को बहुत ठण्ड लग रही थी।  ठण्ड के मारे उसका बुरा हाल था। उसने बिना देखे ही कह दिया , "ले आए , डाल दो जल्दी से मेरे ऊपर। " सबने ठन्डे पानी की बाल्टियां युवक के ऊपर पलट दीं। "मार दिया रे , मार दिया रे" कहकर वो चिल्लाया और एकदम से खाट से उठा। लेकिन यह क्या , वह तो खाट से उठ ही नहीं पाया। ठन्डे पानी के कारण उसका शरीर अकड़ गया था। युवक की चिल्लाने की आवाज सुनकर सास , ससुर और गाँव वाले भागे चले आये। दामाद जी को ठन्डे पानी से अकड़ा देखकर सभी घबरा गए और जल्दी से उसको को घर के अंदर ले गए और अंगीठी जलाकर उसकी सिकाई करी। सिकाई से गर्मी मिलने के बाद उसके के हाथ पैर थोड़े खुले , तभी सिकाई करते करते साले सालियों का हाथ लगने से अंगीठी से एक जलता हुआ कोयला युवक के दस हजार के कच्छे पर गिर गया। उसे बहुत तेज जलन हुई।  उस जलन को तो वह सह गया पर उसे अपने १० हजार के कच्छे के जलने से उसे बहुत गुस्सा आ गया। उसने जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया , "मूर्खो तुमने मेरा १० हजार का कच्छा जला दिया। .. .... मूर्खो तुमने मेरा १० हजार का कच्छा जला दिया। .. .... " 

तभी उस युवक के माँ ने उसके गाल पर एक थप्पड़ मारा और बोली , "निकम्मे सूरज सिर पर चढ़ आया है , बहू को लेने उसके ससुराल नहीं जायेगा क्या। हमेशा पड़ा पड़ा सोता रहता है। और ये सपने में क्या कच्छा , कच्छा बोल रहा था। छी , तुझे सपने में भी कच्छे नजर आते हैं।  उठ खड़ा हो। " थप्पड़ और डांट खाकर उसकी नींद टूटी और अपने आप को सुरक्षित अपने घर में पूरे कपड़ों में पाकर , उसने सोचा कि शुक्र है ये सपना ही था। सपने में ऐसी दुर्गति होने पश्चात् उस युवक ने कसम खाई कि वो अब किसी से कोई शरारत नहीं करेगा क्योंकि वो समझ गया था कि हमेशा स्याना कौवा ही गोबर में मुँह मारता है। उसने दुकानदार से स्याना बनने की कोशिश की और दुकानदार ने उसे गोबर का स्वाद चखा दिया। 

Moral of the Story  for Kids : 1. जैसे को तैसा। 2. सेर को सवासेर मिल ही जाता है। 3. स्याना कौवा हमेशा गोबर में ही मुँह मारता है। 

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हिंदी कविता - चारुचंद्र की चंचल किरणें (Hindi Poem - Charu Chandra Ki Chanchal Kirne)

Hindi Poem - Charu Chandra Ki Chanchal Kirne



मित्रो , प्रस्तुत कविता 'चारुचंद्र की चंचल किरणें'  में कवि मैथिलीशरण गुप्त अपने काव्यग्रंथ ' पंचवटी ' में, भगवान श्रीराम , माता सीता और भाई लक्ष्मण द्वारा वनवास के समय पंचवटी नामक स्थान पर बिताई एक चाँदनी रात का वर्णन कर रहे है , जब भगवान राम और माता सीता विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मण पंचवटी में कुटिया के बाहर पहरा दे रहे हैं। प्रस्तुत है हिंदी में अर्थ / भावार्थ सहित मैथिलीशरण गुप्त जी की एक उत्कृष्ट रचना 'चारुचंद्र की चंचल किरणें' । इसमें उन्होंने बहुत ही अच्छे तरीके से चाँदनी रात में किरणों का खेल और लक्ष्मण जी की मनोस्थिति का वर्णन किया है। 


चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और भूमि (थल) सभी स्थानों पर खेल रहीं हैं। पृथ्वी (अवनि) से आकाश तले  (अम्बरतल) तक चंद्रमा की स्वच्छ चाँदनी फैली (बिछी) हुई है. पृथ्वी हरी घास के तिनकों की चोंच (नोंकों) के माध्यम से अपने आनंद (पुलक) को व्यक्त कर रही है। ऐसा लगता है पेड़ (तरु) भी हल्की (मन्द) हवा के झोकों से झूम रहे हैं। 


पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,

जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

पंचवटी में छाया में पत्तों की एक सुंदर कुटिया (पर्ण-कुटीर) बनी हुई है। जिसके सामने (सम्मुख) एक साफ चट्टान या पत्थर (शिला) पर एक धैर्यवान (धीर) , बहादुर (वीर) और निर्भय मन वाला (निर्भीकमना) एक व्यक्ति (लक्ष्मण) बैठा हुआ है। यह कौन धनुष धारण करने वाला है (धनुर्धर) है जो जाग रहा है , जबकि सारा संसार (भुवन भर) सो रहा है। भोगी जीवन जीने वाला , पुष्प (कुसुम) के सामान कोमल यह व्यक्ति , आज एक हथियार (आयुध) धारण किये हुए योगी जैसा दिखाई देता (दृष्टिगत) है। 


किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,

राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है

नींद (निद्रा) का त्याग करके , यह वीर (लक्ष्मण), व्रतधारी किस व्रत (प्रण) का पालन कर रहा है। राजसुख भोगने (राजभोग्य) के लिए योग्य (लायक) यह व्यक्ति , जैसे वन (विपिन) में वैराग्य धारण किये हुए बैठा है। जिसका यह पहरेदार (प्रहरी) बना बैठा है , उस कुटिया (कुटीर) में क्या धन (बहुमूल्य वस्तु) है। जिसकी रखा के लिए इसका शरीर (तन), मन और जीवन लगा हुआ (रत) है। 


मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,

तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

धरती (मर्त्यलोक या मृत्युलोक) का मैल मिटाने (मेटने) जो (सीता माता) अपने पति (स्वामी) के साथ जो आयीं हैं। वो तीनों लोकों की लक्ष्मी आज इस कुटिया में रह रहीं हैं। वो (सीता जी ) एक वीर-वंश (रघुवंश) की लाज हैं इसलिए उनका पहरेदार (प्रहरी)  भी वीर ही होना चाहिए क्योंकि  वह स्थान (देश) निर्जन (विजन) है , रात (निशा) भी बाकी (शेष) है और चारों और राक्षसी (निशाचरी) माया का प्रभाव है, यानि कि उस क्षेत्र में राक्षस रहते हैं । 


कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता,

आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई

जब मनुष्य के पास कोई नहीं होता , तब भी उसका मन चुपचाप नहीं रहता।  मनुष्य का मन (आप) मनुष्य की (आपकी) बात सुनता रहता है और अपनी कहता रहता है । इसी प्रकार संयमी धनुर्धारी (लक्ष्मण) भी कभी कभी (बीच-बीच) में इधर उधर मुस्कान वाली (मोदमयी) दृष्टि डालकर मन ही मन अपने आप से बातें कर रहे हैं। 


क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा,

है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप

कितनी साफ चांदनी है यह और कितनी ठहरी हुई (निस्तब्ध) रात (निशा) है। हलकी हलकी (मंद) स्वछंद खुशबू (सु गंध) आ रही है। कौन सी दिशा है जो आनंदित नहीं (निरानंद) है, यानि कि सभी ओर आनंद है। अब भी (रात्री में भी) नियति रुपी नर्तकी (नियति -नटी) के काम (कार्य कलाप) बंद नहीं हैं बल्कि कितनी शांति से हो रहे हैं। 
*नियति का अर्थ है - निश्चित जो होने वाला है या प्रकृति के निश्चित कार्य कलाप। 


है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,

रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है

सबके सोने के पश्चात यह धरती मोती (ओस रुपी) बिखेर देती है । और सुबह होने पर सूर्य प्रकट होने पर ओस की बूँदे ऐसे गायब हो जाती हैं जैसे सूर्य ने मोती बटोर लिए हों। और जब सूर्य अस्त होता है तो शाम आती है जो कि आराम प्रदान करती है। संध्या (या रात्री पूर्व का समय) की काया का रंग श्याम (काला) होता है , जिससे उसका एक नया ही रूप प्रकट होता है। 


सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,

अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

जहाँ एक ओर सुंदर और चंचल ओस की बूंदों से प्रकृति हँसती और प्रसन्न (हर्षित) होती है, वहीं दूसरी और वही प्रकृति बहुत भावुक (अति आत्मीया) होकर उन्हीं ओस की बूंदों से रोती हुई प्रतीत होती है। जहाँ एक ओर प्रकृति अनजाने में की हुई भूलों पर भी वो निर्दयता (अदय) से सजा (दण्ड) देती है वहीं दूसरी और बूढ़ों की भी बच्चों की भाँति दयाभाव (सदय) से सेवा करती है। 


तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,

वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की,
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की

तेरह वर्ष बीत (व्यतीत) चुके हैं (वनवास को), पर लगता है जैसे कल की ही बात हो जब  हमको (राम , लक्ष्मण और सीता) को वन में जाते (आते) देखकर , दुःख (आर्त्त) के कारण पिताजी (तात) बेहोश (अचेत) हो गए थे। अब वनवास की अवधि पूरी होने का समय निकट आ चुका है। परन्तु इस व्यक्ति (लक्ष्मण) को इससे (राम सीता की सेवा से) बढ़कर किस धन की प्राप्ति होगी। 


और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,

व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक,
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक

और भगवान राम (आर्य) को (क्या प्राप्ति होगी वनवास पूरा होने पर) क्योंकि राजकार्य (राज्य-भार) तो वो केवल जनता (प्रजा) की भलाई के लिए ही स्वीकारेंगे (धारेंगे) । वो स्वयं तो राजकार्य में व्यस्त रहेंगे और हम सबको भी मजबूरी (विवशमें भूल जायेंगे (बिसारेंगे)। लोगों का उपकार (लोकोपकार) सोचकर हमें भी इसका कोई दुःख (शोक) नहीं होगा। पर क्या यह मनुष्यलोक (नरलोक) अपना भला (हित) स्वयं (आप) नहीं कर सकता। 


-- मैथिलीशरण गुप्त


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निबंध - तुलसीदास का जीवन परिचय (Essay - Biography of Tulsidas in Hindi)

Tulsidas
Goswami Tulsidas

तुलसीदास (Tulsidas)

तुलसीदास, जिन्हें गोस्वामी तुलसीदास भी कहा जाता है , कलियुग के एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें पाँच भगवानों  , राम, लक्ष्मण , हनुमान , शिव और पार्वती के दर्शन प्राप्त हुए हैं। महाकवि तुलसीदास भगवान राम के परम भक्त थे। उनके अनुसार भगवान राम निर्गुण और सगुण की परिभाषा से भी परे हैं और भगवान राम का नाम लिए बिना मोक्ष की इच्छा रखना इस प्रकार है जैसे बारिश की बूंदों को पकड़कर आसमान पर जाने की इच्छा रखना। (पढ़ें : श्री राम पर कविता (Poem on Shree Ram)) तुलसीदास ने संस्कृत , अवधि और ब्रज भाषा में कई रचनाएं लिखीं। पर उनको सर्वाधिक ख्याति उनकी अवधी भाषा की सबसे विख्यात रचना , रामचरितमानस के रचयिता के रूप में मिली। हनुमान चालीसा का रचयिता भी उनको ही माना जाता है। वाराणसी में गंगा नदी के एक घाट का नाम तुलसीघाट उन्हीं के नाम पर पड़ा है। वाराणसी में जिस स्थान पर उनको हनुमान जी के दर्शन हुए उस स्थान पर उन्होंने संकटमोचन मंदिर की स्थापना की। तुलसीदास ने ही भारत रामलीलाओं की शुरुआत भी की।

तुलसीदास का पूर्व जन्म

भविष्योत्तर पुराण के अनुसार , तुलसीदास पूर्व जन्म में महर्षि बाल्मीकि थे, जिन्होंने त्रेता युग में रामायण की रचना की थी। पढ़ें : रामायण पर कविता (Poem on Ramayana) बाल्मीकि की लिखी रामायण में भगवान श्री राम का जीवन चरित्र संस्कृत भाषा में वर्णित है। एक बार भगवान राम की रावण पर विजय के पश्चात् , हनुमान जी ने महर्षि बाल्मीकि से रामायण सुनाने का आग्रह किया , जिसे बाल्मीकि जी ने टाल दिया। तब हनुमान जी हिमालय पर चले गए और वहाँ राम की भक्ति में लीन हो गए।  वहाँ उन्होंने पत्थरों और चट्टानों पर अपने नाखूनों से खुरचकर नाट्य रूप में राम कथा लिख डाली , जिसे महानाटक या हनुमान नाटक की संज्ञा दी गयी है। जब बाल्मीकि जी ने उसे पढ़ा तो बहुत दुखी हुए। उन्हें लगा कि हनुमान जी की उस उत्कृष्ट कृति के सामने उनकी रामायण को कोई नहीं पूछेगा। बाल्मीकि जी को दुखी देख , हनुमान जी बहुत दुखी हुए और उन्होंने वे पत्थर और चट्टानें समुन्द्र में फेंक दीं और बाल्मीकि जी से कहा कि वे (बाल्मीकि जी) कलियुग में तुलसीदास के नाम से जन्म लेंगे और स्थनीय भाषा में रामायण लिखेंगे। पढ़ें : कैसे मिली  बाल्मीकि को रामायण लिखने की प्रेरणा (How Balmiki got inspiration to write Ramayana)

तुलसीदास का जन्म

तुलसीदास के जन्म स्थान और जन्म वर्ष को लेकर विशेषज्ञों की राय भिन्न है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म  स्थान कासगंज उत्तर प्रदेश में सोरों नामक स्थान पर या राजापुर (चित्रकूट) में 1532 ईस्वी (या 1497 ईस्वी) में एक ब्राह्मण कुल में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था।
मान्यता के अनुसार तुलसीदास अपनी माता के गर्भ में 12 माह तक रहे। उनके जन्म के समय वे एक पांच वर्ष के बालक से सामान दिखाई देते थे। उनके मुँह में 32 दांत थे और जन्म लेते ही उन्होंने राम शब्द का उच्चारण किया इसीलिए उनका नाम रामबोला रखा गया। अशुभ नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उनके जन्म से उनकी पिता की तुरंत मृत्यु का संयोग था , इसलिए उनके जन्म के चार दिन बार  ही उनके माता पिता ने उनका त्याग कर दिया। उनको उनकी माता हुलसी की नौकरानी चुनिया अपने साथ ले गयी। जब वो पांच वर्ष के थे तो चुनिया की मृत्यु हो गयी और तुलसीदास अनाथ हो गए। वो भीख मांग कर गुजारा करने लगे। कहा जाता है तब स्वयं माता पार्वती ने उनकी देखभाल की।

तुलसीदास की शिक्षा दीक्षा

6-7 वर्ष की आयु में रामबोला को गुरु नरहरिदास ने अपना लिया। रामबोला को गुरु नरहरिदास ने विरक्त दीक्षा देकर उसका नया नाम तुलसीदास रखा। 7 वर्ष की आयु में गुरु नरहरिदास ने अयोध्या में तुलसीदास का उपनयन संस्कार किया। इसके बाद तुलसीदास की शिक्षा आरम्भ हुई। नरहरिदास उनको वराह क्षेत्र , सोरों , जो कि वर्तमान कासगंज उत्तर प्रदेश में है , ले आये और उन्होंने तुलसीदास को कई बार रामायण सुनाई , जिसमें से कुछ ही तुलसीदास की समझ आयी। फिर तुलसीदास वाराणसी आ गए , जहाँ नरहरिदास के मित्र, गुरु शेष सनातन से उन्होंने संस्कृत , वेद , वेदांग और ज्योतिष की शिक्षा ली।

पत्नी से मिली राम भक्ति की प्रेरणा

तुलसीदास की पत्नी का नाम रत्नावली था, जिससे उनको तारक नामक पुत्र हुआ जिसकी मृत्यु बचपन में ही हो गयी।  एक बार रत्नावली अपने मायके गयी हुई थीं।  तुलसीदास अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते थे। वे पत्नी से मिलने के लिए रात में तैरकर यमुना नदी पार कर के अपनी पत्नी के घर पहुंचे।  उनकी पत्नी पहली मंज़िल पर सो रहीं थीं।  वो अँधेरे में एक सांप को रस्सी समझ कर , उसे पकड़कर पहली मजिल पर पहुँच गए।  यह जान कर रत्नावली उन पर बहुत नाराज हुईं और उन्होंने तुलसीदास को कहा :

"हाड़ मांस की मैं  बनी , तामै ऐसी प्रीत।
ऐसी जो श्री राम में , होती ना भवभीत।"

इसका अर्थ है : मेरी देह हड्डियों और मांस की बनी हुई है , जिससे तुम इतना प्यार करते हो।  इतना प्यार  यदि तुम भगवान श्री राम से करते तो अवश्य ही इस भव सागर रुपी संसार से तुम्हारा भय ख़त्म हो जाता। तुलसीदास को पत्नी के ये वचन चुभ गए और उन्होंने गृहस्थ जीवन को त्याग कर भगवान राम की शरण में जाने का निश्चय किया।

शिव पार्वती के दर्शन एवं रामचरितमानस की रचना।

तुलसीदास ने वाराणसी में संस्कृत भाषा में रामायण लिखना आरम्भ किया। कहते हैं जो भी तुलसीदास दिन में लिखा करते थे , वह रात में अपने आप ही नष्ट हो जाता था।  ऐसा सात दिन तक होता रहा।  आंठवे दिन भगवान शंकर (शिव) और पार्वती ने उन्हें स्वपन में दर्शन दिए और उनसे संस्कृत के बजाए स्थानीय जनमानस की भाषा में लिखने के लिए कहा।  तुलसीदास जाग गए और उन्हें साक्षात् शिव और पार्वती के दर्शन हुए।  उन्होंने तुलसीदास को आशीर्वाद दिया और उन्हें अयोध्या जाकर अवधी भाषा में राम चरित्र (राम कथा) लिखने के लिए प्रेरित किया। 1575 ईस्वी में तुलसीदास ने राम नवमी के दिन अवधी भाषा में रामचरितमानस की रचना आरम्भ की और उन्होंने 1577 ईस्वी में विवाह पंचमी (जिस दिन राम और सीता का विवाह हुआ था) के दिन यह रचना पूर्ण की। इसके पश्चात् तुलसीदास वाराणसी आये और उन्होंने प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर में स्वरचित रामचरितमानस का गायन किया। उन्होंने रामचरित मानस मंदिर में ही रख दी। पुजारियों ने रामचरितमानस को सभी ग्रंथों में सबसे नीचे रख दिया।  सुबह जब मंदिर के द्वार खोले गए तो रामचरितमानस सब ग्रंथों में सबसे ऊपर रखी मिली तथा उस पर भगवान शिव के हस्ताक्षर "सत्यम् शिवम् सुंदरम्" लिखे हुए थे, जिनका अर्थ है , सत्य है , शाश्वत है , सुन्दर है।

कुछ ब्राह्मणों ने तुलसीदास की रामचरितमानस चुराने के लिए चोरो को उनके आश्रम पर भेजा। चोरों ने देखा को दो पुरुष , उनमें से एक शयाम वर्ण के थे और एक गोरे रंग के, हाथ में धनुष बाण लेकर तुलसीदास के घर की रक्षा कर रहे थे। चोर चोरी ना कर सके।  सुबह चोरों ने तुलसीदास से पूछा की उनके घर की रक्षा करने वाले वे रक्षक कौन थे तो तुलसीदास समझ गए की अवश्य ही चोरों को भगवान राम और लक्ष्मण के दर्शन हुए हैं।  तुलसीदास यह जान कर बहुत दुखी हुए की उनके घर की रक्षा स्वयं भगवान राम को करनी पड़ी।  उन्होंने रामचरित मानस को छोड़कर बाकी सब कुछ दान कर दिया।  इसका चोरों पर इतना असर हुआ कि उन्होंने चोरी करना छोड़ दिया और राम भक्त बन गए।

तुलसीदास को राम लक्ष्मण के दर्शन प्राप्त हुए 

वाराणसी में तुलसीदास रोज राम चरितमानस का गायन करने थे जिसे सुनने के लिए बहुत लोग आया करते थे।  तुलसीदास जिस वन में शौच के लिए जाया करते थे , वहां शौच से बचा हुआ जल एक पेड़ की जड़ो में दाल दिया करते थे। एक दिन उस पेड़ पर रहने वाला यक्ष उनके सामने प्रस्तुत हुआ और उसने कहा की आप जो जल रोज इस पेड़ की जड़ों में डालते हैं उससे मेरी प्यास बुझती है इसलिए आप कोई वर मांग लें।  तुलसीदास ने राम के दर्शनों की अभिलाषा प्रकट की तो यक्ष ने कहा की यह उसके बस में नहीं पर आपकी कथा सुनने रोज हनुमान जी आते हैं वो आपको अवश्य ही राम के दर्शन करा सकते हैं।  वे एक वृद्ध दीन हीन के रूप में आते हैं , सबसे पहले आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं। यह जानकर तुलसीदास ने हनुमान जी को पहचानकर उनके पैर पकड़ लिए और राम दर्शन की इच्छा प्रकट की।  हनुमान जी ने उन्हें चित्रकूट जाने के लिए कहा।  चित्रकूट में कामदगिरि की परक्रमा करते हुए उनको राम लक्ष्मण के दर्शन हुए पर तुलसीदास उन्हें पहचान न पाए और जब हनुमान जी ने बताया की वे ही राम लक्ष्मण थे तो तुलसीदास बहुत पछताए और हनुमान जी से एक बार और दर्शन की इच्छा प्रकट की। अगले दिन सुबह जब तुलसीदास चन्दन घिस रहे थे तब भगवान राम ने तुलसीदास से बालक रूप में आकर चन्दन माँगा। तुलसीदास इस बार भी पहचान न सके। यह देख हनुमान जी ने तोते के रूप में घोषणा कर दी :

चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर

तुलसीदास चन्दन घिसें , तिलक देत रघुबीर।। 

हनुमान जी की घोषणा सुनते ही तुलसीदास समझ गए की चन्दन मांगने वाला बालक राम ही है और इस प्रकार तुलसीदास को राम के दर्शन प्राप्त हुए। इस कथा को विस्तार से जानने के लिए पढ़ें : तुलसीदास जी का श्री राम से मिलन (When Tulsidasa Met Lord Shree Ram)

तुलसीदास  के  चमत्कार

एक बार एक स्त्री के पति की मृत्यु हो गयी।  तुलसीदास जो को इसका पता नहीं था और उन्होंने अज्ञानता वश उस स्त्री तो सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे दिया। जब उस स्त्री ने तुलसीदास जी को बताया की उनका आशीर्वाद पूरा नहीं हो सकता क्योंकि उसके पति की मृत्यु अभी अभी हुई है , तब अपने आशीर्वाद का मान रखने के लिए , तुलसीदास ने उस व्यक्ति को जीवन दान दिया।

एक दूसरे चमत्कार में तुलसीदास एक  बार वृन्दावन गए और वहाँ वो एक कृष्ण मंदिर में पूजा करने गए। पढ़ें : भगवान श्री कृष्ण (Lord Shri Krishna)  वहां के पुजारी और लोगों ने उनसे उपहास करने के लिए कहा कि पूजा का फल तभी मिलता है जब सिर अपने इष्ट देवता के सामने झुकाया जाये, आपके इष्ट देव तो राम हैं और यह मंदिर तो कृष्ण का है। तब तुलसीदास ने भगवान की मूर्ति से कहा कि :


काह कहौं छबि आजुकि भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै धरो धनुष शर हाथ ॥


इसका अर्थ है , भगवन आपकी छवि का वर्णन मैं क्या करूँ , क्योंकि आप बहुत अनुपम दिखाई देते हैं।  (पर) तुलसीदास सिर तभी झुकायेगा जब आप हाथ में धनुष बाण धारण करेंगे , अर्थात जब आप राम रूप में प्रकट होंगे और देखते ही देखते वह कृष्ण मूर्ति , राम मूर्ति में बदल गयी। पढ़ें : हिंदी कहानी - मूर्ति में भगवान दिखाई देना (Hindi Story - To see God in statue)

तुलसीदास की अकबर  से मुलाकात और राम हनुमान चालीसा की रचना

तुलसीदास के इन चमत्कारों की चर्चा अकबर के दरबार में भी जा पहुंची। उसने तुलसीदास को फतेहपुर सीकरी दरबार में बुला भेजा और उनसे चमत्कार दिखाने के लिए कहा।  तुलसीदास ने कहा की वे कोई चमत्कार करना नहीं जानते , वे तो केवल राम को जानते हैं।  अकबर उनके इस उत्तर से नाराज हो गया और उसने उनको कारावास में कैद कर लिया। कारावास में रहकर तुलसीदास ने हनुमान जी की भक्ति में हनुमान चालीसा की रचना की और चालीस दिन तक उसका पाठ किया।  तब ना जाने कहाँ से बहुत सारे बंदरों ने अकबर के किले पर और शहर पर आक्रमण कर दिया।  अकबर की शक्तिशाली सेना भी उस आक्रमण को झेल ना सकी। तब अकबर के सलाहकारों ने अकबर को समझाया की हो न हो यह चमत्कार कैदखाने में कैद उस हिन्दू फ़क़ीर का ही है।  अकबर को बात समझ में आ गयी।  उसने तुलसीदास से क्षमा मांगी और उनको आज़ाद कर दिया।  तब बंदरों का आक्रमण अपने आप ही बंद हो गया।  तुलसीदास ने अकबर को उसकी राजधानी फतेहपुर सीकरी से दूर ले जाने के लिए कहा।  तब अकबर ने अपनी राजधानी दिल्ली में स्थानांतरित कर ली।

तुलसीदास की रचनाएं :

तुलसीदास की कुछ मुख्य रचनाएं इस प्रकार हैं :

1. रामचरितमानस : अवधी भाषा में राम का जीवन चरित्र।
2. दोहावली : 573 दोहों का संकलन, अधिकांशतः ब्रज भाषा में।
3. साहित्य रत्न या रत्न रामायण : ब्रिज भाषा में लिखी कविताओं में रामायण का प्रतिपादन।
4. गीतावली : ब्रज भाषा लिखे गीतों में रामायण का प्रतिपादन।
5. कृष्ण गीतावली या कृष्णावली : कृष्ण भगवन को समर्पित ब्रज भाषा में 61 गीतों का संकलन।
6. विनय पत्रिका : राम से भक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करते हुए 279 छंद।

तुलसीदास की कुछ छोटी रचनाएं इस प्रकार हैं :

1. बरवै रामायण : अवधी भाषा में रामायण का संक्षिप्त रूप।
2. पार्वती मंगल : अवधि भाषा में 164 छंदों में पार्वती जी की शादी का वर्णन।
3. जानकी मंगल : अवधि भाषा में 216 छंदों में सीता जी की शादी का वर्णन।
4. रामलला नहछू : राम के नहछू संस्कार (उपनयन संस्कार से पहले पेअर के नाखून काटना) के बारे में अवधी में २० छंद।
5. रामाज्ञा प्रश्न : शाब्दिक रूप से राम की इच्छा का उद्धरण करते हुए 343 दोहे।
6. वैराग्य सांदीपनि : ब्रज भाषा में वैराग्य की महिमा का बखान करते हुए 60 छंद।

तुलसीदास की कुछ और रचनाएं इस प्रकार हैं :

1. हनुमान चालीसा : हनुमान जी के सम्मान में अवधी भाषा में ४० चोपाई और २ दोहे।
2. संकटमोचन हनुमानाष्टक : हनुमान जी के लिए अवधी भाषा में 8 छंद।
3. हनुमान बाहुक : 1607 ईस्वी में तुलसीदास जो को पूरे शरीर में विशेषकर हाथ में बहुत दर्द हुआ। तब उन्होंने हनुमान बाहुक नामक कृति की रचना की। जिसमे ब्रज भाषा में 44 छंद हैं।  उसमें उन्होंने अपने दर्द का वर्णन किया। इस रचना से उनका दर्द काम हो गया।
4. तुलसी सतसई : भिन्न क्रम में दोहावली और रामाज्ञा प्रश्न के 747 दोहे।

मृत्यु

विनयपत्रिका तुलसीदास की आखिरी रचना थी जिसको तुलसीदास  ने तब लिखा जब कलि युग उनको परेशान करने लगा। 279 छंदों में तुलसीदास ने राम से प्रार्थना की कि राम उनको भक्ति प्रदान करें और अपनी शरण में ले लें। तुलसीदास के अनुसार भगवान राम ने स्वयं विनयपत्रिका पर हस्ताक्षर किये।

तुलसीदास की मृत्यु वाराणसी  गंगा नदी के किनारे अस्सी घाट पर हुई।


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